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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४१

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नैतिक मसला ५०९ असहयोग नहीं कर सकते; क्योंकि हम उन लोगोंके साथ व्यक्तियोंके रूपमें तो असहयोग कर नहीं रहे हैं, जो सरकारी तन्त्र चलाते हैं; हम तो उनकी उस शासन- प्रणालीके साथ असहयोग कर रहे हैं। गवर्नरकी हैसियतसे सर जॉर्ज लॉयडको हम सरकारी काममें मदद देने से इनकार करते हैं; परन्तु एक अंग्रेज भाईके नाते हम सर जॉर्ज लॉयडको सामाजिक सेवाओंसे कभी वंचित नहीं कर सकते । मुझे यह कहते दुःख होता है कि यह शरारत हिन्दुओं और मुसलमानोंसे ही शुरू हुई । सामाजिक रूपसे लोगोंको तंग किया गया और उनके साथ जबर्दस्ती की गई। हाँ, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने हमेशा ही इन बातोंकी उतने जोरसे निन्दा नहीं की जितनी कि मैं कर सकता था । जब यह प्रवृत्ति आम बनने लगी थी तब मैं आन्दोलनसे अपनेको अलग कर सकता था। पर हमने शीघ्र ही अपने मार्गको स्थिति के अनुसार सुधार लिया। हम अधिक सहनशील हो गये । परन्तु आँखोंको स्पष्ट न दिखे, ऐसे रूपमें जबर्दस्ती चलती रही। मैंने उसे चलने दिया -- सोचा कि यह आप ही अपनी मौत मर जायेगी। परन्तु बम्बईमें मैंने देखा कि वह मरी नहीं । १७ तारीखको तो उसने बड़ा ही उग्र रूप धारण कर लिया । हमने अपने हाथों अपने पाँवपर कुल्हाड़ी मार ली। हमने खिलाफतके कामको और उसके साथ ही पंजाब और स्वराज्य के कामको भी नुकसान पहुँचाया। अब हमको अपनी भूल सुधारनी होगी और अल्पसंख्यक जातियोंको अच्छी तरह यकीन दिलाना होगा कि हम उनको जरा भी तंग न करेंगे। अगर ईसाई लोग हैट लगाना और अंग्रेज बनकर रहना पसन्द करते हैं, तो उन्हें इसकी आजादी होनी चाहिए। अगर पारसी अपने फेंटको ही पहनना चाहें, तो उन्हें हर तरहसे इसका हक है । अगर ये दोनों सरकार के साथ रहने में ही अपना हित समझते हों, तो हम सिर्फ दलीलोंसे समझाकर ही उनको गलतीसे विमुख कर सकते हैं, उनको मारपीट कर नहीं । हम जितनी ज्यादा जबर्दस्ती करेंगे उतनी ही अधिक सुरक्षा हम सरकारको प्रदान करेंगे; भले ही इसका कारण सिर्फ यही हो कि हमारी बनिस्बत सरकारके पास जबर्दस्ती करनेका ज्यादा कारगर साधन मौजूद है । अगर हम सरकार की अपेक्षा ज्यादा बलप्रयोग करते हैं, तो इसका मतलब होगा भारत-माताको और भी अधिक गुलामीमें जकड़ना । स्वराज्यका अर्थ है - हरएकको आजादी हो हरएकको आजादी हो - छोटेसे-छोटे लोग भी अपनी मर्जीके मुताबिक चलें और रहें - उनकी स्वाधीनतामें बलपूर्वक कोई भी हस्तक्षेप न किया जाये। और यह अहिंसात्मक असहयोग स्वतन्त्र लोकमत तैयार करने और उसको प्रभावपूर्ण बनानेका ही उपाय है। यह स्पष्ट ही है कि जब देशमें पूर्ण मत-स्वातन्त्र्य होगा, तब बहुमत के अनुसार ही काम चलेगा। यदि हमारी संख्या कम हो, तो जोर- जबर्दस्ती के बावजूद हम अपने धर्मपर आरूढ़ रहकर सच्चे धर्मनिष्ठ सिद्ध हो सकते हैं | हज़रत मुहम्मद बहुमतके दबावको मानकर भी अपने धर्मपर दृढ़ बने रहे, और ज्यों ही बहुमत उनकी ओर हुआ, उन्होंने अपने अनुयायियोंसे साफ कह दिया कि मजहब के मामलेमें जोर-जबर्दस्ती न होनी चाहिए।" शाब्दिक या शारीरिक रूपसे Gandhi Heritage Portal