बम्बईके नागरिकोंसे ५११ उन्हें पूरी तरह बेगुनाह नहीं मानेंगे। यदि केवल एक ही पक्ष अपराध करता रहे और दूसरा बराबर धैर्य से सहता रहे तो अपराधी पक्ष अपने प्रयत्नमें थक जायेगा। यदि क्रियाकी कोई प्रतिक्रिया ही न हो तो संसारका उद्धार हो जाये । लेकिन आमतौरपर हम गालीका जवाब तमाचेसे देते हैं । एक तमाचेका जवाब दोसे दिया जाता है और फिर उसका जवाब लातसे और लातका गोलीसे दिया जाता है । इस तरह पापका दायरा बराबर बढ़ता जाता है । परन्तु आमतौर पर जो लोग " दाँतके बदले दाँत " के सिद्धान्तमें विश्वास रखते हैं, वे कुछ समय बाद एक-दूसरेको क्षमा कर देते हैं और दोस्त बन जाते हैं। क्या इस सामान्य नियमपर चलना असम्भव है ? इसलिए मैं पारसी और ईसाई दोस्तोंसे यह कहने में नहीं झिझकता कि वे पारस्परिक क्षमा-दानके नियमपर चलकर एक दूसरेके अपराध भूल जायें । । परन्तु हिन्दुओं और मुसलमानोंपर जो विशेष उत्तरदायित्व है, उसपर मैं अवश्य ही जोर देता हूँ । पारसी और ईसाई क्षमा करें या न करें, हिन्दुओं और मुसलमानोंको अपना अपराध स्वीकार करके, ईश्वरसे क्षमा माँगकर और शान्त रहकर अपने आपको शुद्ध करना है । जिन लोगोंको क्षति पहुँची है या जिन्हें प्रियजनोंसे वंचित होना पड़ा है उन्हें इस तरहकी चोटोंका असर अवश्य महसूस होगा। उनमें से कुछ तो इतने गरीब हैं कि नुकसान झेल ही नहीं सकते । हमें उनकी स्थिति समझनी चाहिए। और मुझे विश्वास है कि जो इस नुकसानकी मार सह नहीं सकते, ऐसे लोगोंके नुकसानकी जाँच करने और अन्दाजा लगानेके लिए एक गैर-सरकारी समिति नियुक्त की जायेगी और यह समिति उन लोगोंकी सहायताके लिए आवश्यक राशि संग्रह करेगी। साथ ही मुझे आशा है कि कोई भी पक्ष कानून या सरकारकी शरणमें नहीं जायेगा । यह सलाह मैं सिर्फ एक असहयोगीके ही नाते नहीं दे रहा हूँ, यह सलाह अपने इस अनुभव के आधार पर दे रहा हूँ कि निजी पंच-फैसले द्वारा ऐसे मामलोंका अधिक सच्चा और उपयुक्त निपटारा होता है । कटुतासे बचनेका भी यही रास्ता है । शान्ति कायम करनेका सबसे आसान तरीका यह है कि हम अदालतमें एक-दूसरे के खिलाफ शिकायत करनेका खयाल छोड़कर निरोधक उपायोंकी ओर अपना ध्यान केन्द्रित करें ताकि ऐसा पागलपन फिर नहीं किया जा सके। और मुझे आशा है कि ऐसे उपाय अपनाकर बम्बई अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा फिर प्राप्त कर लेगा । आपका सेवक, मो० क० गांधी [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १-१२-१९२१ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४३
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