२१२. पत्र : बारडोली और आनन्दके निवासियोंके नाम बारडोली और आनन्दके भाई-बहनो, मैं जानता हूँ कि आपके दुःखकी सीमा नहीं रही। आपने बड़ी आशा की थी। आपने इसी वर्षके भीतर अपने यज्ञ, अपने बलिदानके द्वारा स्वराज्य प्राप्त करने, मुसलमान-भाइयों तथा पंजाबके घावोंको भरने और अली-भाई इत्यादि कैदियोंको छुड़वानेका जिम्मा लिया था । पर ईश्वरने कुछ और ही सोचा था । भक्त नरसिंहने सच ही कहा है 'बने नरसे तो कोई न रहे दुःखी' । किन्तु फल हमारे हाथमें कहाँ है ? हमें तो अपने उद्देश्यकी दिशामें परिश्रम ही करना चाहिए । जब श्री रामचन्द्र-जैसोंको राजगद्दी मिलने के समय वनवास मिला तो फिर हमारी क्या बिसात है ? मैं अपने परम मित्रकी बात सोचता हूँ । उन्होंने पंजाबमें मेरे साथ काम किया था। वे पंजाब के दुःखको देख कर रो पड़ते थे। सारी जिन्दगी वे ऐश-आराममें रहे। उन्होंने मेरी बात सुनकर आराम छोड़ दिया है, जवानोंकी तरह काममें जुट गये हैं और उसमें सुख मान लिया है। उन्हें यह सोचकर बड़ी पीड़ा होती है कि वे आज अपने खेड़ा जिले और उसमें भी आनन्द ताल्लुकेके लोगोंको तुरन्त जेल नहीं भेज पा रहे हैं । किन्तु मैं उनको और आप सबको इस बातका विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि सब्र का फल मीठा ही होगा । अभी कुछ बिगड़ा नहीं है। हम बाजी हार नहीं गये हैं। बल्कि हम तो दुःखमेंसे सुख पैदा करनेमें समर्थ हुए हैं। अशान्ति हुई अवश्य, परन्तु ऐसा मालूम होता है कि उसमें से हमने शान्ति प्राप्त की । ईश्वरने छोटा-सा दुःख देकर हमें बड़े दुःखसे बचा लिया है । बारडोलीसे मुझे एक पत्र मिला है। बारडोली के बारेमें भी एक अन्य पत्र आया है और खेड़ाके बारेमें भी एक पत्र मैंने देखा है । उन सबसे यही जान पड़ता है कि आप अच्छी तरह तैयार नहीं हैं । न शान्तिके मामलेमें, न स्वदेशी के मामलेमें। एक पत्र में व्यौरा दे कर कहा गया है कि बारडोलीमें बलप्रयोग किया गया। जबर्दस्ती विदेशी टोपियाँ छीनी गईं और शराबके दूकानदारोंके प्रति भी बलका प्रयोग किया गया और उन्हें गालियाँ दी गईं। इन दोनों जिलोंमें बहुतसे लोग दिखावे के लिए खादी पहनते हैं । बहुतसे ऐसे लोग हैं जो घर के बाहर तो खादी पहनकर निकलते हैं मगर जिनके घरोंमें विदेशी कपड़ेसे सन्दूकें भरी हैं और खूंटियोंपर भी विदेशी कपड़े टॅगे हुए हैं। औरतोंमें तो मरदोंसे भी कम स्वदेशी वस्त्रोंका चलन है । खेड़ासे प्राप्त पत्रमें कहा गया है कि सब-कुछ खरा ही खरा नहीं है - खोटा या तो आँखोंकी १. १४१४-१४७९; गुजरातके सन्त कवि । २. अब्बास तैयबजी । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४६
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