टिप्पणियाँ ५२३ कंठसे प्रशंसा की, जिन्होंने अतिवांछित शान्ति स्थापित की थी। श्री के० टी० पॉल और श्री डगलसने भी उनकी कुछ कम तारीफ नहीं की। श्री वीमादलालने अन्तमें धन्यवाद देते हुए मियाँ छोटानीका उल्लेख खास तौरपर किया था । अब पक्षपातके विषयको लीजिए। एक और जहाँ पुलिस पारसियोंकी रक्षा करनेमें असमर्थ रही, वहीं दूसरी ओर कितने ही पारसियोंने मुझसे कहा है कि जब पारसी हुल्लड़बाज उपद्रव मचा रहे थे तब पुलिस खड़ी खड़ी तमाशा देखती रही। लेकिन मैं इस बातपर ज्यादा जोर नहीं देना चाहता। मेरी इच्छा नहीं है कि मैं पुलिस या फौजके आदमियोंपर व्यक्तिके नाते दोषारोपण करूँ । मुझे आशा है कि एक-न-एक दिन मैं उन्हें सत्यके मार्गपर चलनेवाले निर्दोष लोगोंके पक्षमें ले आऊँगा । उनमें अधि- कांश हिन्दुस्तानी हैं । और मैं तो अंग्रेज लोगोंके बारेमें भी आशा करता हूँ कि अन्तमें उनपर भी अनुकूल प्रतिक्रिया अवश्य होगी, बशर्ते कि असहयोगी लोग अपने अहिंसा- धर्मका पालन सच्चे हृदयसे करें । हाँ, पुलिस और फौजवालोंको इतना श्रेय दिया जा सकता है कि उन्होंने अन्धान्धुध तरीकेसे लोगोंकी जानें नहीं ली हैं; उन्होंने आतंक स्थापित करनेकी कोशिश नहीं की। अब मैं मलाबार और मद्रासका उदाहरण देकर इस अध्यायको समाप्त करता हूँ । चूंकि लोगोंको मलाबारमें काम करनेके लिए नहीं जाने दिया जाता है, इसलिए वहाँ अभीतक झगड़ा चल रहा है। इसी तरह मद्रासमें भी कोई दो महीने तक हड़तालवाले स्थानोंमें जो मार-काट जारी रही, उसका यही कारण था कि वहाँ भी लोगोंको काम नहीं करने दिया गया या वे कर नहीं पाये । हाँ, बम्बई- सरकार, अगर चाहे तो, यह श्रेय ले सकती है कि जब लोग शान्ति स्थापना- की चेष्टा कर रहे थे तब उसने उनके काममें किसी तरह हस्तक्षेप नहीं किया । इसकी जड़में कौन था ? ऐसे लोगोंकी कमी नहीं है जो कहते हैं कि यह सारी गड़बड़ो खुफिया पुलिसकी खड़ी की हुई थी और उसीने इसको कायम रखा। मुझे यहाँ, भारतमें, रहते कोई छ: साल हो गये हैं । और इस अवधि में मैं बराबर खुफिया पुलिसके खिलाफ ऐसी शिकायत सुनता रहा हूँ । खुद मुझपर भी उसकी नजर रही है। लेकिन मैं उन तमाम बेबुनि- याद अफवाहोंको मानने में असमर्थ हूँ जो उसके विषयमें चारों ओर फैलाई जा रही हैं। मैं मानता हूँ कि वह भ्रष्ट है और उसपर लगाये जानेवाले बहुतसे इल्जाम सही साबित किये जा सकते हैं; पर उनमें अतिरंजना बहुत है । अगर ये तमाम आरोप सच हों, तब तो बड़ी भयंकर बात होगी; और वह हमारी पहले दर्जेकी कायरताका सबूत होगा । इस महकमे के सम्बन्धमें जितनी गन्दी बातें सुनी जाती हैं, वे उन्हीं लोगों- के बीच सम्भव हो सकती हैं, जिनमें न तो बहादुरी हो और न आत्म-सम्मानकी भावना । बम्बईके उपद्रवके दिनोंमें कई जिम्मेदार और प्रतिष्ठित आदमियोंने कहा कि श्रीमती सरोजिनी नायडू तथा मेरे और दूसरे लोगोंपर हमला होनेकी तथा मस्जिदों, गिरजाघरों आदिको नुकसान पहुँचानेकी अफवाहें खुफिया पुलिसवालोंने ही फैलाई थीं। यह कहा गया कि आगजनी और ट्रामगाड़ियोंकी तोड़फोड़ भी उन्होंने कराई । मैं इन सब बातोंपर विश्वास करनेमें असमर्थ हूँ। और अगर वे सच हों तो कहना होगा Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५५५
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