५२४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय कि बम्बई के लोग बड़ी आसानीसे झाँसेमें आ जाते हैं, और अपने नागरिक अधिकारों- का उपयोग करने लायक भी नहीं हैं। स्वराज्य-प्राप्ति के योग्य बनने के लिए हमें जिन गुणोंकी जरूरत है, उनमें एक यह गुण भी आवश्यक है कि हममें खुफिया पुलिसको मात देनेकी योग्यता हो । अगर हम ऐसे काम करनेके लिए आसानीसे उकसाये जा सकते हों जिनसे हमें हानि पहुँचती हो, या उन बातोंपर हमारा विश्वास कराया जा सके, जिनको हमें न मानना चाहिए, तो हम अपने लक्ष्यतक कभी नहीं पहुँच सकते। यदि हम खुल्लमखुल्ला और सच्चे दिलसे अहिंसक बने रहें, तो हम गलत रास्तेपर नहीं भटक सकते। हमारे बीच जो उपद्रवी लोग हैं उनपर या तो हमारा नियन्त्रण रहेगा या फिर खुफिया पुलिसका । यदि हम उन्हें काबू में नहीं रख सकते तो हमें निकट भविष्यमें स्वराज्य पानेके खयालको बस नमस्कार ही कर लेना चाहिए । अफवाहोंसे होशियार इन घटनाओंसे हमें अनेक सीखें मिलती हैं। उनमें एक यह है कि हमें अफवाहों- पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए और हरएक बड़े-बड़े मुहल्ले और बड़ी-बड़ी सड़कोंपर कांग्रेस और खिलाफतका एक-एक दफ्तर होना चाहिए, जहाँ जाकर लोग अफवाहोंकी सचाई और झुठाईका इत्मीनान कर सकें। यदि सफल होना है तो हम सबको बिल्कुल एक होकर एक दिलसे काम करना जरूरी है, और इसके लिए हमें यह जरूर जानना चाहिए कि महज अफवाहोंके भरोसे बिना सोचे-समझे कोई काम न करें। सनसनी फैलानेमें तीन-चौथाई हाथ शरारतभरी अफवाहोंका ही था। अगर लोग सुनें कि कुछ मन्दिर आदि तोड़ दिये गये हैं और कुछ बड़े नेता मारे गये या घायल हुए हैं तो भी क्या हुआ ? उन्हें बिना सलाह-मशविरे के काम न करना चाहिए। क्या कोई सैनिक अपने सेना-नायककी मृत्युकी अथवा अपनी मसजिद या मन्दिरकी पवित्रता भंग की जानेकी खबर सुनकर मनमाने ढंगसे आचरण करने लगता है? यदि वह ऐसा करे तो अपने उद्देश्यको हानि पहुँचायेगा और गोलीतक मार देनेके लायक समझा जायेगा। फिर हम तो शान्ति सेनाके सैनिक हैं। अपनी ही खुशीसे हम इसमें दाखिल हुए हैं । शस्त्र-सज्जित सैनिकोंकी अपेक्षा हममें आत्मसंयमकी क्षमता अधिक है। फिर हमें कोई एकाध लड़ाई तो नहीं लड़नी है, हमें देश और धर्मकी आजादी हासिल करनी है। तब तो हमारे लिए और भी आवश्यक है कि हम पूरी तरह मिल-जुलकर काम करें। आवश्यक अतिरंजना अतिरंजना हमेशा ही निन्दनीय होती है; परन्तु इस नियममें सिर्फ एक ही अपवाद है । स्वयं अपने दोषोंके सम्बन्ध में अतिरंजना अवश्य करनी चाहिए। हमें अपने दोष बहुट छोटे दिखाई देते हैं और जब हम उन्हें हजार गुना बड़ा बनाकर देखेंगे तभी उनका सच्चा रूप हमारी नजर में आयेगा । परन्तु दूसरोंके दोष हमें हमेशा बड़े ही नजर आते हैं । अतएव यह आवश्यक है कि हम दूसरोंके दोषोंको कम करके देखें | और यदि हम इन दोनों प्रक्रियाओंको एक ही साथ और विवेकपूर्वक लागू करें तो हम वांछित Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५५६
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