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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५६०

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५२८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय विपत्तियोंका शिकार हो जायेगा। इन वर्षोंमें आपने जो कुछ भी किया है, वह सब मिट्टीमें मिल जायेगा । इस किस्मकी यह एक ही चेतावनी मुझे नहीं मिली है। बम्बई देशका एक सबसे बड़ा केन्द्र है । अतएव उसकी बदौलत लोगोंमें उथल-पुथल होना स्वाभाविक है । अल्पसंख्यक लोगोंके अधिकारोंकी रक्षाका अर्थ है, कमजोरोंकी रक्षा, और कमजोरोंकी रक्षाके मानी हैं, बूढ़ों, बालकों और अबलाओं तथा उन सब लोगोंकी रक्षा जो दीन- दुःखी हैं। और यदि आज हिन्दुओं और मुसलमानोंकी एकताका उपयोग पारसियों और ईसाइयोंके खिलाफ किया जाता है तो कल ही वह एकता लोभ-लालचंके अथवा मिथ्या धार्मिकताके दबावसे टूट सकती है। यह किसी भी तरह स्वराज्यका कोई अच्छा चित्र तो नहीं है । भारतको यदि स्वतन्त्र होना है, तो इसके लिए पूर्ण और सच्ची अहिंसा के सिवा दूसरा मार्ग ही नहीं है। अतएव अहिंसाका उपयोग हिंसाकी तैयारीके लिए बिलकुल न होना चाहिए। इसको समझना स्वराज्यका और स्वधर्मका साक्षात्कार करना है। हिन्दू और मुसलमान सावधान रहें, 'गीता' और 'कुरान'का गलत अर्थ न लगायें। और आजमाइशके तौरपर वे अपने संयुक्त बलको अल्पसंख्यक जातियोंकी रक्षामें लगायें। इससे वे एक-दूसरेकी रक्षा करना सीखेंगे । नीति नहीं बल्कि धर्म और यह तबतक नहीं किया जा सकता जबतक कि इस सालके अनुभवसे हम यह न सीख लें कि “भारतकी स्वतन्त्रता और भारतके सभी धर्मों और सम्प्र- दायोंकी एकता प्राप्त करनेके लिए और उसे कायम रखने के लिए, अहिंसाको हमें अपना एकमात्र धर्म मानना चाहिए।" इसके बाद भी हर सम्प्रदायको अपने धर्मकी रक्षाके लिए, और सबको मिलकर भारतकी प्रतिरक्षाके लिए, लड़नेकी स्वतन्त्रता रह जाती है । किन्तु अहिंसाको एक ऐसी नीति या तरकीब नहीं समझना चाहिए जिसे हमें भारतकी स्वतन्त्रता प्राप्त करने या उसे मजबूत बनानेके लिए आजमाना है । इसलिए हिन्दुओं और मुसलमानोंको शुभारम्भके तौरपर पारसियों, यहूदियों और ईसाइयोंसे, जिनमें अंग्रेज भी शामिल हैं, चाहे वे सहयोगी हों या असहयोगी, प्रेम करना चाहिए और उनकी सेवा करनी चाहिए। और यदि हमें ऐसा करना है तो हमारी वाणीमें कटुता नहीं होनी चाहिए और, लोगोंसे अपना मत स्वीकार करानेकी प्रक्रियामें, किसी बच्चेपर भी • उसकी टोपी उतारनेके लिए -- हाथ नहीं - लगाना चाहिए, और न ही शराबियोंके साथ उनकी शराबकी लत छुड़ाने के लिए जोर- जबर्दस्ती करनी चाहिए। हमारा ध्येय केवल यह होना चाहिए कि हमारी अपील उनके विवेकके लिए, दिमागके लिए और हृदयके लिए हो। हमें कभी भी, वचनों द्वारा या शारीरिक रूपसे, पाशविक शक्तिका प्रयोग नहीं करना चाहिए। जब भारतके लाखों-करोड़ों लोग स्वेच्छासे और अपनी समझसे हमारे पक्षमें हो जायेंगे, तो हम स्वराज्य प्राप्त कर लेंगे। सहयोगियोंको सबसे बड़ा भय यह है कि अहिंसा हिंसाके लिए एक पर्दा है और नेक नीयत लोगोंकी कोशिशके बावजूद यह आन्दोलन अन्तमें उच्छृंखल और उपद्रवी लोगोंके हाथमें चला जायेगा । हम इस भयको तर्कसे दूर नहीं कर सकते। ऐसे Gandhi Heritage Portal