५३२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय यदि वह अपने मालिकसे सन्तुष्ट न हो तो वह केवल इस्तीफा दे सकता है । परन्तु कर्मचारियोंका समूचा समुदाय तो इकबारगी ऐसा भी नहीं कर सकता, क्योंकि अपनी राजनीतिक रायको मनवाने के लिए वे बिना वाजिब नोटिसके काम छोड़नेकी धमकी नहीं दे सकते । संक्षेपमें, मिल-मजदूरों और ऐसे अन्य कर्मचारियोंको इस बात के लिए नहीं उकसाना चाहिए कि वे अपने मालिकोंपर छुट्टी देनेके लिए दबाव डालें । अहिंसा- त्मक कार्यवाही उतनी आसान नहीं है जितनी कि बहुतसे लोग समझते हैं। मैंने लोगोंको यह कहते सुना है कि शराबकी दुकानोंपर जानेवालोंकी कसकर टाँगें पकड़ लेना अहिंसा है । इसी तरह लड़कोंने शराब बेचनेवालोंको गन्दी गालियाँ देना अहिंसात्मक कार्य मान रखा है। यह भाषाके साथ सिर्फ खिलवाड़ है और बम्बई में इसका कड़वा फल चखनेको मिला है। यदि हम अहिंसाको अच्छी तरह आजमाना चाहते हैं तो हमें स्वयं अपने प्रति सच्चा होना चाहिए। यदि हम अपने विचारोंको अहिंसात्मक न बना सकें, तो भी हमें अपने वचन और कर्मको तो इतना संयमित करना ही चाहिए कि वे पूर्णतया अहिंसात्मक हो जायें । यदि हमें व्यवहारमें यह चीज असम्भव या अत्यन्त कठिन लगती हो, तो हमें कोशिश छोड़ देनी चाहिए। किन्तु हमें अपनी असमर्थता- के बदले जीवनके इस महानतम सिद्धान्तको दोषी नहीं ठहराना चाहिए। यदि हमें असफलता ही मिलनी है, तो वह अहिंसाकी असफलता नहीं होगी, बल्कि अहिंसाके पालन में हिंसक लोगोंकी असफलता होगी । आन्ध्र द्वारा की गई परिभाषा स्वराज्यकी विभिन्न परिभाषाएँ की गई हैं। श्री गोपाल कृष्णयाने, जिनपर दूसरी बार मुकदमा चलाया गया है और जिन्हें और सजा दी गई है, जो कि पहलीके साथ- साथ ही चलेगी, मजिस्ट्रेटके सामने एक लम्बा वक्तव्य दिया है। यह उनके राजनीतिक मतकी विज्ञप्तिसे अधिक उनके विश्वासका आध्यात्मिक विवेचन है । इससे निश्चय ही यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस भाषणपर मुकदमा चलाया गया है उसमें न तो हिंसा थी और न हिंसाके लिए उकसानेकी ही बात थी । लेकिन मेरी दिलचस्पी यहाँ केवल स्वराज्यकी उनकी रोचक परिभाषामें है । वह यहाँ दी जा रही है : फारसके हमलोंसे जैसे पुराने यूनानियोंमें एकता आ गई थी, उसी तरह समान राजनीतिक यातना हिन्दू और मुसलमानोंको एक नहीं कर सकेगी, बल्कि वह एकता एक दूसरेके धर्म के लिए सम्मान, आदर और प्रेम रखनेसे तथा उनके अपने-अपने रूपको आवश्यक समझने से ही स्थापित हो सकेगी। इसलिए स्वराज्य- का अर्थ हिन्दूधर्म, मुस्लिम धर्म, ईसाई धर्म, पारसी धर्म, सिख धर्म संक्षेपमें सबके स्वधर्मकी रक्षा और सबका एक संयुक्त संघ है। सभी धर्मोंको आज प्रत्यक्षवादी नास्तिक दर्शन, औद्योगिक अराजकता और आध्यात्मिक दिवालिया- पनसे, जो इस समय संसारको घेरे हुए है, विनाशका खतरा है। चरित्रवान व्यक्तियोंको जब उनके धार्मिक विश्वासके लिए कारावास दिया जा रहा हो, तो निश्चय ही इसका अर्थ यह है कि हम अपने लक्ष्यके निकट पहुँच रहे हैं । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५६४
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