सरदार गुरुदत्तसिंह
सात साल तक छिपे रहना और पुलिस के हाथ न आना और उसके बाद अपने को खुलेआम पुलिस के हाथ सौंप देना कोई मामूली बात नहीं है। परन्तु सरदार गुरुदत्तसिंह ने ऐसा ही आश्चर्यजनक काम किया है। मेरे सामने उनका खुला पत्र और दूसरे कागज़ात हैं। अपनी अन्य व्यस्तताओं के कारण मैं इन पर ध्यान नहीं दे पा रहा हूँ। परन्तु मैं सिखों को इस बात के लिए बधाई दिए बिना नहीं रह सकता कि जब सरदार गुरुदत्तसिंह ने आत्मसमर्पण किया और मजिस्ट्रेट ने उन्हें हिरासत में लिया, उस समय उन्होंने शान्ति रखी। अहिंसा के बारे में हमें इतना दृढ़ होना चाहिए कि हम बड़े से बड़े साहस के कदम भी पूर्ण आत्मविश्वास के साथ उठा सकें। अहिंसात्मक बनने के लिए स्वदेशी से बढ़कर और कोई चीज़ नहीं। एक व्यक्ति ने मुझे लम्बा पत्र भेजा है जिसमें यह कहा गया है कि मुझे इस बात पर आग्रह करना चाहिए कि स्वदेशी का कार्यक्रम पूरा होने से पहले कोई भी तहसील सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू न करे। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ। मैं यह जानता हूँ कि यदि समस्त भारत स्वदेशी को अपना ले, अर्थात् अपनी करोड़ों कुटियों में खादी तैयार करके विदेशी वस्त्र का पूर्ण बहिष्कार कर दे, तो हिंसा असम्भव हो जायेगी। मैं चाहूँगा कि सिख और अन्य भारतीय अपना सारा ध्यान हाथ से सूत कातने और कपड़ा बुनने पर लगायें।
खादी टोपी के लिए दस दिन की सजा
बम्बई के पिछले दंगे में खादी टोपी की बहुत चर्चा रही। डॉ० साठे पर अपनी खादी टोपी न उतारने के कारण बुरी तरह हमला किया गया। अब मैंने सुना है कि फोर्ट के नाविकों ने बहुत-से निर्दोष व्यक्तियों की खादी टोपियाँ ज़बरदस्ती छीनी हैं। मैं तो यही आशा करता हूँ कि इस निरर्थक अत्याचार से राष्ट्र का संकल्प और दृढ़ होगा और हजारों लोग खादी टोपी के लिए, जो तेजी के साथ स्वदेशी और स्वराज्य का एक स्पष्ट प्रतीक बनती जा रही है, मरने को तैयार हो जायेंगे। परन्तु इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण बंगाल से मिला है। बंगाल के कोमिल्ला जिले में ब्राह्मण-बाड़ी के एस० डी० ओ० श्री टी० एच० एलिस ने १६ तारीख को यह नोटिस जारी किया :
- सरकार ने यह फैसला किया है कि तथाकथित गांधी टोपियाँ पहनना भारतीय दण्ड संहिता की धारा २२८ के अधीन एक अपराध है। भद्र लोगों को यह चेतावनी दी जाती है कि आदेश लागू किया जायेगा।
परिणामस्वरूप, एक स्वयंसेवक पर, इस आदेश के बावजूद खादी टोपी पहनने पर, दस रुपया जुर्माना किया गया। उसने जुर्माना अदा करने से इनकार कर दिया और दस दिन जेल में रहना पसन्द किया। मैं यहाँ धारा २२८ उद्धृत कर रहा हूँ :
- जो भी कोई व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी का, जब कि वह सरकारी कर्मचारी अदालती कार्रवाई की किसी भी स्थिति में बैठा हो, जानबूझकर अपमान करेगा या उसको किसी प्रकार की बाधा पहुँचायेगा, उसे छः मास तक के साधारण कारावास की या एक हजार रुपये तक के जुर्माने की अथवा दोनों की सजा दी जायेगी।