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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५७२

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२१८. स्वयंसेवक- दलपर कुठार बम्बईने प्रान्तीय सरकारोंको यह मौका दे दिया है कि वे व्यवस्थित ढंगसे दमन- चक्र चलायें और असहयोग आन्दोलनको बिलकुल समाप्त कर देनेकी कोशिश करें । बंगाल, संयुक्त प्रान्त, पंजाब और दिल्लीकी सरकारोंने स्वयंसेवक-संगठनोंको छिन्न-भिन्न कर देनेकी जो अधिसूचनाएँ जारी की हैं वे बम्बईकी सरकारके जवाबमें ही हैं। मैं अपनी तरफसे तो इन अधिसूचनाओंका स्वागत ही करता हूँ । इन अधिसूचनाओंके रूपमें हमें एक ऐसा कारण मिल गया जिससे हम अब सहज ही सविनय अवज्ञा कर सकते हैं । यदि हम सरकारकी इस चुनौतीको स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, तो हम तत्काल अपनी ताकत आजमा सकते हैं । सत्याग्रही अपना संघर्ष शुरू करनेका अवसर स्वयं आप ही निश्चित करता है । यह सविनय अवज्ञाकी एक अपनी खूबी है । वह तबतक अवज्ञा करना उचित नहीं समझता, जबतक उसे ऐसा करना आवश्यक न लगे । सरकार अपनी तरफसे उसे कितना ही उत्तेजित क्यों न करे, वह उससे सविनय अवज्ञा शुरू नहीं करा सकती । ऐसी अवस्थामें यदि वे प्रान्त जहाँ ये अधिसूचनाएँ जारी हुई हैं तैयार हों तो उनके लिए सिर्फ इतना ही काफी है कि वे अपने स्वयंसेवक संगठनोंको भंग करनेसे इनकार कर दें, और हर स्वयंसेवक अपनेको जेल पहुँचा सकता है। लेकिन हमें पहले अपनी बुनियाद अच्छी तरह देख लेनी चाहिए। इन संगठनोंपर जो आरोप लगाया गया है वह यह है कि वे ऐसी संस्थाएँ हैं जो बल-प्रयोगका साधन बनती हैं, शान्ति- रक्षाका नहीं । अतएव हमारा पहला फर्ज यह है कि हम इस आरोपकी जाँच करें और अगर वह किसी भी अंशमें हमपर घटता हो तो अपने उस दोषको बिलकुल निर्मूल कर डालें। जिन-जिन स्वयंसेवकोंने बल-प्रयोग किया हो या अपने वचनों और कार्योंके द्वारा बल-प्रयोगकी धमकी भी दी हो, उनको अवश्य उनके कामसे हटा देना चाहिए। संयोगसे कार्यसमितिने भी इसी मौकेपर स्वयंसेवक दलोंका संगठन करनेका प्रस्ताव' स्वीकृत किया है। मुझे आशा है कि प्रत्येक प्रान्तकी कांग्रेस कमेटी और खिलाफत- समितियाँ इस कामको तुरन्त उठा लेंगी और तमाम स्वयंसेवक दल एक ही संगठनमें शामिल हो जायेंगे तथा जो भी स्वयंसेवक अहिंसाके सिद्धान्तका कायल न हो वह उसमें न रहने पायेगा । तब यदि इन संस्थाओंके काममें किसी तरहका हस्तक्षेप किया गया तो हम संघर्ष छेड़ सकते हैं। पर इस संघर्षकी शर्त यह है कि जब स्वयंसेवकोंको जेल भेजा जाये तब शेष सभी लोग खामोश रहें और शान्ति बनाये रखें। बिना शोरगुलके, बिना भीड़-भाड़के जेलोंको भर देनेका यही सबसे उचित अवसर होगा । यदि हम चुपचाप कष्ट सहन करनेके महत्वके कायल हों, तो हमें सरकारके लिए अपनी गिर- १. बम्बई में २३-११-१९२१ को स्वीकृत प्रस्ताव । Gandhi Heritage Portal