गुर किल्ली ५४७ तो इसमें कौन बड़ाई है ? हिन्दू यदि मुसलमानके साथ भी उतना ही प्रेम करें, उनके रिवाजोंको बरदाश्त करें तो यह अच्छाईकी निशानी है। असहयोगी असहयोगीके साथ मेलजोल रखे तो इसमें कौन खूबी है ? परन्तु असहयोगी सह्योगीके साथ तीव्र मतभेद होते हुए भी, मुहब्बत करे, धीरज रखे - यह वीरता है, नम्रता है । उनको बदनाम करने, तुच्छ मानने और धिक्कारने में बड़प्पन नहीं है । बड़प्पन उनके घर नंगे पैर दौड़े जाकर उनकी सेवा करनेमें है । -- हमने अपना यह कर्त्तव्य जितना चाहिए उतना नहीं निबाहा । मैंने भी इसके विषयमें लिखा और कहा; परन्तु जितना चाहिए उतना जोर नहीं दिया। मुझे इसका पछतावा हो रहा है । बम्बईके अनुभवने मेरी आँखें खोल दी हैं । बम्बईके अनुभवने बतला दिया है कि मेरी सहिष्णुता उथली थी । जब-जब सहयोगियोंके ऊपर शाब्दिक आक्रमण हुए, तब-तब यदि मैंने कड़ाईसे काम लिया होता तो आज हम बहुत उन्नति कर चुके होते। जब कभी किसीने जबरदस्ती किसीकी टोपी छीनी तब यदि हर बार मैंने उसका जोरसे विरोध किया होता तो आज उसका बड़ा अच्छा फल मिला होता। ऐसे महान संग्रामके नायकपदका उपभोग करना और पूरे तौरपर जाग्रत न रहना महापाप है । यह मैं जानता हूँ । इस युद्धके नायकमें यदि दीनता, दुर्बलता, और लाचारी हो तो उसे अपना पद छोड़ देना चाहिए। जहाँसे भूले हैं, अब वहींसे हमें अपनी भूल सुधारनी होगी । अब हमें अपने मनसे सहयोगियोंके प्रति, पारसियों और ईसाइयोंके प्रति, तथा अंग्रेजोंके प्रति रोषको निकाल डालना चाहिए। उन्हें भी भाई समझना चाहिए। उनका हम बहिष्कार न करें। उनके पानी, नाई आदिको न रोकें । उन्हें खाना खिलाकर खायें, उनकी सेवा करके प्रसन्न रहें। सभी धर्मो में निहित इस नियमका रहस्य समझ सकनेके बाद ही स्वराज्य जल्दी और आसानीसे मिल सकेगा, उसके पहले नहीं । अतएव जहाँ-जहाँ कानूनके सविनय भंगकी तैयारियाँ हो रही हैं वहाँ-वहाँ हमें सबसे पहले यही काम करना है कि वहाँ जितने सहयोगी हैं उन सबके साथ मेल-मुहब्बत करें और मतभेद रहते हुए भी मित्रता कायम रखें। [ गुजरातीसे ] नवजीवन, ४-१२-१९२१ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५७९
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