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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५८७

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टिप्पणियाँ ५५५ 33 इसी प्रसंग में मुझे एक अन्य मित्रका पत्र प्राप्त हुआ है जिसमें वे दुःखी हृदयसे लिखते हैं: " हम खादीकी महिमासे तो परिचित हैं, लेकिन जिस विवाहमें उपस्थित लोग खादीसे सज्जित हों, स्त्रियाँ भी खादी पहने हों, पर अश्लील गालियाँ गा रही हों, तो वहाँ क्या करना चाहिए ? खादीकी खातिर ये गन्दी गालियाँ सुनें अथवा खादीकी पोशाक होनेके बावजूद ऐसी गालियोंसे अपने कानोंको अपवित्र होनेसे रोकें ? इस प्रश्नको मैंने कोई उत्तर देनेके विचारसे नहीं लिखा है और प्रश्नकर्त्ताने भी उत्तर पाने के उद्देश्यसे इसे नहीं पूछा है । प्रश्नकर्त्ताने तो टीकाके लोभसे इस रिवाजकी ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया है। उनका कहना है कि जहाँ लड़के और लड़कियोंको भी ऐसी बीभत्स शिक्षा दी जाती है वहाँ धर्म-राज्यकी क्या आशा की जा सकती है ? प्रश्न दुःख उपजानेवाला है । स्त्रियाँ जिस समय ऐसे अश्लील गीत गाती हैं उस समय उन्हें उनकी अश्लीलताका शायद ही भान रहता होगा। ऐसी बुरी आदतें गई नहीं हैं, इसके लिए पुरुष वर्ग ही दोषी है । पुरुष वर्गने इस बातका विचार ही नहीं किया कि उन्हें जो ज्ञानोपलब्धि हुई है उसे उन्हें स्त्रियोंको भी देना चाहिए। ऐसे विषयोंपर पुरुषवर्ग बहुत आसानीसे सत्याग्रह कर सकता है । यह युग नवयुवकोंका है। वे यदि नम्र और नीतिमान हों तो ऐसी कुप्रथाको तुरन्त दूर कर सकते हैं। शिक्षित लड़कियाँ भी ऐसे रिवाजके विरुद्ध सत्याग्रह कर उसे दूर कर सकती हैं। प्रत्येक पाठक बहन ऐसी कुप्रथाओंका विरोध कर सकती है। समझदार स्त्रियाँ अगर ऐसे कार्यों में भाग लेनेसे इनकार कर दें तो यह रिवाज तुरन्त बन्द हो जाये । बेमेल जोड़ी बेमेल जोड़ों तथा पुरुषोंके दूसरी और तीसरी बार विवाह करनेकी समस्या कठिन है । यह गन्दगी शायद काठियावाड़ में सबसे अधिक है । जबतक गरीब माता-पिता अपनी लड़कियोंको बेचने के लिए और विषयान्ध धनवान केवल अपनी विषय-वासनाकी तृप्ति के लिए पैसा देने को तैयार होते हैं तथा जबतक समाज इस बातको सहन कर सकता है तबतक इस गन्दगीका दूर होना लगभग असम्भव है । स्वराज्यकी प्रवृत्तिमें धर्मकी जो झाँकी दिखाई दे रही है उसके सिलसिले में अगर पुरुष अपनी विषय- वासनाको मर्यादित करना सीखें तो ही साठ वर्षके बूढ़े पत्नीकी मृत्यु होनेपर दूसरे ही दिन विवाह करनेसे रुकेंगे। समाज अगर दूसरोंके दोषोंकी चौकसी-भर करे तो यह सुधार नहीं हो सकता। ऐसे दुःखोंका निवारण तिरस्कारसे नहीं हो सकता। यह तो केवल विवेकसे, दलीलसे और दयासे होगा। जो पिता अपनी लड़कीको बेचता है और जो उस लड़कीको खरीदता है, वे दोनों रोगी हैं और दयाके पात्र हैं। अगर हम हमेशा उनका तिरस्कार करेंगे तो वे अपना हृदय कठोर बना लेंगे और निर्लज्ज हो जायेंगे। लेकिन यदि हम उनके रोगका उपचार कर उन्हें शर्मिन्दा करेंगे तो वे अवश्य मर्यादा सीखेंगे। प्रत्येक जाति-बिरादरी इस सम्बन्धमें समय रहते सुधार कर सकती है । ऐसे विवाहोंमें समझदार लोग शरीक न हों, इस बातको मैं केवल उपचारके रूपमें ही नहीं देखता, बल्कि इसे धर्म मानता हूँ । इस धर्मके पालनमें दया होनी चाहिए, तिरस्कार अथवा अभिमान नहीं । Gandhi Heritage Portal