५५८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय ही बलपर जीती है। जब उसके जोर-जुल्मके उपाय कारगर नहीं रह जाते तब वह अपने आप मौत के घाट उतर जाती है । अपने नेताओंके हमसे अलग कर दिये जानेके बाद यदि हमने खुद अपने अन्दर और अपने द्वारा उनके तेज और उत्साहको प्रकट नहीं किया, तो कहना चाहिए कि हम उनके अनुगामी होनेके लायक थे ही नहीं । सिखोंका बलिदान हमारे सिख भाई खुद अपनी और सारे भारतकी समस्या हल कर रहे हैं । अपने मत और विश्वास के नामपर सभी बड़े-बड़े सिख अपनेको बलिवेदीपर चढ़ा रहे हैं। सच्चे सैनिकोंकी तरह, वे एकके बाद एक जेल जा रहे हैं और सो भी बिना भीड़- भाड़, बिना तड़क-भड़क और बिना जरा भी हिंसाके । यदि वे बराबर ऐसा ही साहस, और ऐसी ही शान्ति दिखाते रहे तो वे इसके द्वारा निस्सन्देह अपनी समस्या हल कर लेंगे और भारतकी समस्याको सुलझाने में भी सहायक होंगे। सिख भाई इस समय जो अपने धर्म-प्रेमका परिचय दे रहे हैं उसकी ओर सारा भारत उत्सुकताके साथ टकटकी लगाये है । भारत-प्रेमका पुरस्कार जहाँतक मेरी जानकारी है लाहौर में श्री स्टोक्सकी गिरफ्तारीके सम्बन्ध में बम्बईके समाचारपत्रोंको कोई भी तार नहीं मिला है। यह ताज्जुबकी बात है । मैंने 'ट्रिब्यून' में इस घटना के बारेमें एक पैरा देखा है। मैं सोच ही नहीं पाता कि एक इतनी सनसनीखेज गिरफ्तारी के बारेमें किसीने कोई तार न भेजा हो। इससे मैं यह नतीजा निकालता हूँ कि गिरफ्तारी की सूचनाके तारोंको अली-भाइयोंकी गिरफ्तारीके बारेमें भेजे गये तारोंकी तरह ही या तो दबा दिया गया है या उनको कुछ समय के लिए रोक लिया गया है। श्री स्टोक्सको 'ट्रिब्यून' में छपे उनके लेखोंके सिलसिले में ३ तारीखको लाहौर छावनीमें गिरफ्तार किया गया था। उन लेखोंके बारेमें यह आपत्ति थी कि वे " राजद्रोहकी भावना और सम्राट्की प्रजाके विभिन्न वर्गोंमें घृणाका प्रचार करते" हैं। जिला मजिस्ट्रेटने श्री स्टोक्सको जमानतपर छोड़नेकी बात कही थी, पर श्री स्टोक्सने उसे स्वीकार नहीं किया | सरकारने यह एक विचित्र-सा कदम उठाया है । श्री स्टोक्स मूलतः एक अमेरिकी हैं, जिन्होंने अपने आपको स्वेच्छया ब्रिटिश प्रजा बना लिया है। उन्होंने भारतको अपना घर बना लिया है। शायद ही किसी अमेरिकी या अंग्रेजने आजतक ऐसा किया हो। पिछले महायुद्ध के दौरान उन्होंने सरकारकी बड़ी-बड़ी सेवाएँ की थीं और उच्चाधिकारी लोगोंमें वह सरकारके शुभचिन्तकके रूपमें जाने जाते हैं । उनमें किसी भी दुर्भावनाका कोई सन्देहतक नहीं कर सकता । पर सरकार यह सहन नहीं कर सकी कि वह अपने आपको भारतीयोंके साथ एकात्म महसूस करें और भारतीयोंके दुःखमें दुःख मानें और उनकी ओरसे संघर्ष में हाथ बँटायें । आलोचनाकी खुली छूट उनको नहीं दी जा सकी और इस प्रकार सरकारने उनकी गोरी चमड़ीका जरा भी कोई लिहाज नहीं किया। सरकार आन्दोलनको हर कीमत- पर कुचलने के लिए तुली हुई है। लेकिन यह उसके बसकी बात नहीं। श्री स्टोक्सकी Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५९०
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