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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५९१

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टिप्पणियाँ ५५९ गिरफ्तारी सरकारकी कमजोरीकी जितनी बड़ी निशानी है, लालाजीकी गिरफ्तारी भी शायद इतनी नहीं थी । लालाजीको युद्धके दौरान सरकारकी सेवाका श्रेय प्राप्त नहीं था । लालाजीको एक आन्दोलनकारी माना जाता था । वह गोरी जातिके नहीं हैं । इसलिए जब श्री स्टोक्स जैसे व्यक्तिको गिरफ्तार किया जाता है तब तो बाहरके लोग भी सरकारकी सदाशयताको सन्देहकी दृष्टिसे देखने लगते हैं । बारडोली बारडोली तहसील के लोग बड़ी उत्कण्ठासे मेरे आनेकी राह देख रहे थे । आखिर - कार मौलाना आजाद सोबानीके साथ मैं वहाँ गया । बारडोली तहसीलकी आबादी कोई एक लाख है । उसमें करीब १४० गाँव हैं । वहाँ लगभग ६५ सरकारी मदरसे थे । उनमें से ५१ राष्ट्रीय पाठशालाके रूपमें परिणत हो चुके हैं । जहाँ-कहीं सरकारी मदरसे जारी हैं उनमें लड़कोंकी उपस्थिति-संख्या १० से भी कम है । राष्ट्रीय पाठ- शालाओंमें छः हजारसे ऊपर विद्यार्थी पढ़ रहे हैं; जिनमें कुछ सौ लड़कियाँ भी हैं । इन तमाम पाठशालाओंमें सूत कताई अनिवार्य है। हाँ, अभी नियमपूर्वक उसकी शिक्षा नहीं दी जा रही है और न उसका अभ्यास कराया जाता है। अधिकांश मदरसे तो इन पिछले तीन महीनोंमें ही राष्ट्रीय बनाये गये हैं। सभी गाँवोंमें मैंने देखा कि स्त्रियाँ इस राष्ट्रीय आन्दोलनमें बड़ी दिलचस्पी ले रही हैं। हम वहाँ दो रोज ठहरे । इस बीच छः गाँवोंमें दौरा किया और हजारों आदमियोंसे मिले । अधिकांश लोग ऊपर- से नीचेतक शुद्ध हाथकती खादी पहने थे और औरतें भी बहुत बड़ी तादाद में इसी लिबास में थीं। जो लोग खादी नहीं पहने थे उन्होंने इस बातकी शिकायत की कि हमें खादी नहीं मिल सकी। परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ स्त्री-पुरुषोंने विदेशी कपड़े सर्वथा त्याग दिये हैं। मुझे दुःखके साथ कहना पड़ता है कि कितने ही लोग अब भी घरोंमें उन्हीं कपड़ोंको बरतते हैं। खादी तैयार करनेका काम अभी बहुत- कुछ होना बाकी है। बारडोली तहसीलमें चरखे तो बहुतेरे हैं, पर करघे बहुत ही थोड़े हैं । यहाँकी खास पैदावार कपास है । पाठकोंको यह जानकर दुःख होगा कि अबतक सारी पैदावार बाहर भेजी जाती थी । यहाँ हिन्दू और मुसलमानोंमें पूरा मेल- जोल है । सहयोगियों के साथ के सम्बन्धों में कटुता नहीं है । अछूत लोग बेधड़क सभाओं में आते हैं । फिर भी मैंने यह जता दिया है कि यह स्थिति तबतक सन्तोषजनक नहीं कही जा सकती जबतक राष्ट्रीय पाठशालाओंके व्यवस्थापक 'अछूत' लड़कोंको अपनी पाठशालाओंमें भरती करनेका विशेष प्रयत्न नहीं करते और गाँवके लोग अपने इन दलित भाइयों के कल्याणके लिए खुद अपने तई दिलचस्पी नहीं लेते। कितनी ही शराबकी दुकानोंपर खरीदार दिखते ही नहीं। मुझे जितना कुछ ब्यौरा मालूम हुआ है उसके अनुसार बिना जोरो-जब के ही, अथवा बहुत थोड़ी डर धमकी दिखाकर ही इतनी आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त की गई है। सिर्फ दो या तीन मिसालें ऐसी मिलती कि स्वयंसेवक गाँववालोंके यहाँ गये और जबतक बेचारे उन लोगोंने तंग आकर अपने लड़के सरकारी मदरसोंसे नहीं उठा लिये तबतक वे उनके दरवाजेपर धरना देकर बैठे रहे और उपवास करते रहे। मैंने कार्यकर्त्ताओंको सूचित किया कि इस Gandhi Heritage Portal