५६२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय मुसलमान और सिख प्रतिनिधियोंकी संख्याकी भी आशा करता हूँ। मैं यह भी आशा करता हूँ कि प्रत्येक प्रान्तसे महिलाएँ तथा 'अछूत' प्रतिनिधि भी काफी तादाद में आयेंगे | पण्डित जवाहरलाल नेहरूका जवाब एक पत्र लेखकने पण्डित जवाहरलाल नेहरूपर यह आरोप लगाया था कि उन्होंने वर्तमान शासन प्रणालीके बदले इस प्रणालीके अंग्रेज प्रणेताओं और प्रशासकोंकी निन्दा की है। मैंने इस विषयपर उनसे जिज्ञासा की। उन्होंने उसका बिलकुल साफ और पूरा उत्तर भेजा है, जो नीचे दिया जा रहा है : आगरेके प्रान्तीय सम्मेलन में में तीन मौकोंपर बोला । यह तो नहीं बता सकता कि मैंने ठीक-ठीक किन लफ्जों का इस्तेमाल किया, लेकिन मेरा मतलब क्या था, यह मेरे दिमाग में बहुत साफ था। पहले मौकेपर तो जब प्रच्छन्न रूपसे हिंसाकी चर्चा हुई तो मैंने उसका विरोध किया । हसरत मोहानी अध्यक्ष थे और अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने अहिंसाके सिद्धान्तके प्रति असन्तोष प्रकट किया। कई वक्ताओंने बहुत उग्र भावाका प्रयोग किया और उनकी बातोंसे स्पष्ट था कि वे उस दिनकी कामना कर रहे हैं जब हिंसाको खुलकर खेलनेका मौका मिलेगा। ये सब बातें कराची प्रस्तावके सन्दर्भमें कही गई। मैंने संघर्ष के अहिंसात्मक स्वरूपपर जोर दिया और कहा कि स्वदेशी ही हमारी एकमात्र आशा है । दूसरे दिन मैंने स्वदेशीपर प्रस्ताव पेश किया। एक संशोधनका नोटिस दिया गया था जिसमें ब्रिटिश मालके बहिष्कारकी बात थी। शायद इसी मौके- पर मैंने ऐसे मुहावरों और शब्दोंका इस्तेमाल किया जिन्हें श्री गांधीसे प्रश्न पूछनेवाले व्यक्तिने गलत समझा । मेरा सम्पूर्ण तर्क यही था कि अभीतक तो सिवा स्वदेशीके, स्वतन्त्रता पानेका दूसरा कोई रास्ता हमें कोई दिखा नहीं सका है । मैं हिंसा के सवालपर भी बोला और उसका समाधान कर दिया। इसके बाद मैने अन्य बहुत-सी आपत्तियोंका जवाब दिया। मैंने कहा कि भारतको अंग्रेजोंकी प्रभुतासे मुक्त करानेकी मेरी उत्कट इच्छा है, और स्पष्टतः चरखा और स्वदेशी हो इसके उपाय हैं। तीसरी बार में ब्रिटिश मालके बहिष्कारके सम्बन्धमें पेश किये गये संशो- धनके उत्तरमें बोला। इस संशोधनका मैंने विरोध किया, और उसपर बड़ी गरमा-गरम बहस हुई। दूसरे पक्षसे कोई बीस वक्ता बोले । संशोधनपर मत लिया गया और वह पास न हो सका । १. देखिए “ गाली किसे कहते हैं ?", १७-११-१९२१ । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५९४
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