५६६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय चुनाव केवल कार्यकी सुविधाके लिए किया जाता है, किसी असाधारण गुणके कारण नहीं । नेता क्या है ? अपने बराबरीवालोंमें सबसे आगेका व्यक्ति । किसी-न-किसीको तो आगे रखना ही चाहिए। परन्तु यह कोई जरूरी नहीं कि वह जंजीरकी कम- जोरसे-कमजोर कड़ीसे अधिक मजबूत हो ही। लेकिन एक बार चुनाव कर लेनेके बाद हमारे लिए उसका अनुसरण करना लाजिमी है; अन्यथा जंजीर टूट जायेगी और सब कुछ नष्ट हो जायेगा । हमें अपने ध्येयतक पहुँचने के लिए अब बहुत कुछ करना बाकी नहीं रहा है मैं अपना यह विश्वास लोगोंके दिलमें बैठा देना चाहता हूँ । हमारा रास्ता बिलकुल साफ है । कांग्रेसके मनोनीत सभापति देशबन्धु दासने उसे बिलकुल स्पष्ट शब्दोंमें रखा है : मेरा पहला और आखिरी निवेदन आपसे यही है कि आप लोग अहिंसात्मक असहयोगके आदर्शसे कभी च्युत न हों। मैं जानता हूँ कि इस धर्मका पालन करना कठिन है। मैं यह भी जानता हूँ कि कभी-कभी उत्तेजना इतनी अधिक होती है कि विचार, वाणी और कर्ममें अहिंसक बने रहना अत्यन्त कठिन हो जाता है । तथापि इस आन्दोलनकी सफलता तो इसी महान् सिद्धान्तपर अव- लम्बित है । इस महान् सिद्धान्तको अपने जीवनमें उतारनेकी क्षमता अपने अन्दर पैदा करने के लिए हमें उत्तेजनाकी सभी सम्भावनाओंसे अपनेको बचाना चाहिए। अतएव अब न तो जुलूसोंकी जरूरत है, न विशाल सभाओंकी । जिन लोगोंमें जागृति आ चुकी है बस उनको ही इस ढंगसे अनुशासित बना देना चाहिए कि वे उत्तेजना के समय भी स्थिरचित्त, शान्त रह सकें और रुई धुनने, हाथसे सूत कातने, बुनने आदि रचनात्मक राष्ट्रीय कार्योंके संगठनमें लग जायें, जिससे राष्ट्रके लाखों बेकार लोगोंको रोजी मिले और देशके स्वल्प साधनोंमें वृद्धि हो । हिन्दू-मुस्लिम एकता हमारा अटल सिद्धान्त है। उसके स्थापित करने या प्रदर्शित करनेका एक ही मार्ग है और वह है राष्ट्रीय उत्थानके लिए सब लोग एक साथ मिलजुल कर काम करें अर्थात् सभी लोग अपना सारा समय अकेले खादीकी तैयारीमें ही लगायें । ज्यों ही हम विदेशी कपड़ेका पूर्ण रूपसे बहिष्कार कर देंगे और अपने-अपने प्रान्तों और गाँवोंके लिए आवश्यक खादी वहीं तैयार करना शुरू कर देंगे, त्यों ही हम, सम्भवतः बिना सामूहिक सविनय अवज्ञाके ही आजाद हो सकेंगे। इसलिए हमें उद्धत किस्मकी सविनय अवज्ञाको कमसे कम उस अवस्थातक तो टालना ही चाहिए जबतक कि हम विदेशी कपड़ोंका पूर्ण रूपसे बहिष्कार करके हाथसे कती और बुनी खादी तैयार करने के योग्य न बन जायें। हाँ, अपने आन्दोलनको आगे बढ़ाते हुए जब-जब हम सविनय अवज्ञा करनेको बाध्य हो जायें, तब-तब हमें उसका हृदयसे स्वागत करना चाहिए। इन गिरफ्तारियों और सजाओंकी बदौलत यदि हमारा दिल बैठ गया या हम भटक गये, तो यह हमारी कमजोरी और स्वराज्य पानेकी हमारी अयोग्यताका स्पष्ट Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५९८
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