हम क्या करें ? ५६७ चिह्न होगा। जो सिपाही मरने से डरता है या पूरी कीमत चुकानेसे जी चुराता है वह सच्चा सिपाही नहीं | सच्चे सिपाहीको तो जितना ही अधिक जूझनेका अवसर मिलता है, उतनी ही अधिक खुशीसे वह सबसे आगे बढ़ता है। सरकार अपनी जेलोंमें हमसे जो-जो काम कराये वह सब हमें करना चाहिए। हमारे लिए इस बातको समझ लेना और इसपर कायम रहना आवश्यक है । मुझे इसपर पूर्ण विश्वास हो चला है कि दलीलोंके द्वारा नहीं, बल्कि बेगुनाह लोगोंके कष्टसहनके द्वारा ही सजा देनेवाले और और सजा पानेवाले, दोनोंके दिलपर गहरा असर होता है। ऐसे कष्टसहनको देखकर एक ओर तो देश अपने आलस्य और उदासीनताको त्यागकर उठ खड़ा होगा और दूसरी ओर सरकारको भी अपनी निर्दयता त्यागनी पड़ेगी । परन्तु यह कष्टसहन उन लोगों द्वारा होना चाहिए जो बहादुरीके साथ खुशी-खुशी उसे उठायें, उन अनिच्छुक लोगों द्वारा नहीं जो कमजोर और लाचार हों। जो जेल जा चुके हैं या जानेकी तैयारीमें हैं, वे कह सकते हैं - 'बस, हमारा काम खतम हुआ।' लेकिन हम लोगोंको, जो अभी जेलोंके बाहर हैं, उनके ख़तम किये हुए कामके लायक अपने आपको सिद्ध करना है । यह हम किस तरह सिद्ध करें ? जबतक हम उन्हें आजाद न कर दें या उनके साथ जेलोंमें शामिल न हो जायें, तबतक बराबर उनका काम जारी रखकर हम वैसा करें। जो अधिकसे-अधिक कष्टसहन करता है, वही अधिकसे-अधिक सेवा करता है । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, ८-१२-१९२१ २३०. हम क्या करें ? श्री जयकरके भाषण के परिणामस्वरूप अकोलामें सारे महाराष्ट्रका एक सम्मेलन हुआ है। श्री जयकर एक विचारक हैं, उन्हें अपने देशसे प्यार है । उनकी बातें बरबस ध्यानसे सुननी पड़ती हैं; और ध्यान देने लायक वे होती भी हैं । जो लोग अकोलामें इकट्ठे हुए वे सब उत्कट देशभक्त और देशके तपे हुए सैनिक हैं। वे देशके निर्भीकसे- निर्भीक और सर्वाधिक अनुशासनबद्ध कार्यकर्त्ताओंमें से हैं । अतः जब ये लोग किसी कार्यक्रमसे असहमत हों तब एक बार रुककर सोचना जरूरी ही हो जाता है। श्री जयकरके भाषण और अकोला सम्मेलनने मेरे भीतर विचारोंका तूफान खड़ा कर दिया है। जो परिवर्तन सुझाये गये हैं, उन्हें समझने में, उनके महत्वको ग्रहण करनेमें कोई कठिनाई नहीं हो सकती। अगर अनुचित न माना जाये तो मैं तो कहूँगा कि यह एक अविश्वाससे प्रेरित कार्यक्रम है । यह इस मान्यतापर आधारित है कि स्वराज्य जल्दी नहीं मिल सकता और हमें चाहिए कि मौजूदा शासन-तन्त्रको सुधारने के खयालसे उसका जैसा बन पड़े, वैसा उपयोग करें। अभी जिस कार्यक्रमपर अमल किया जा रहा है वह इस विश्वासपर आधारित है कि मौजूदा तन्त्र बिलकुल बेकार Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५९९
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