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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/६०१

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- हम क्या करें ? ५६९ लेकिन हम वाद-विवादकी मंजिल पार कर चुके हैं। जब सूरज आपके माथेपर चमक रहा हो तो उसकी गरमी देनेकी ताकत किसीको दलील देकर समझानेकी जरूरत नहीं है । और अगर कोई धूपमें भी काँप रहा हो, तो आप लाख दलील दें, उसे सूरजकी गरमीका विश्वास नहीं होगा, और न आप उस काँपते हुए व्यक्तिसे इस कारण झगड़ा ही कर सकते हैं। वह अपने-आपको गरमी पहुँचाने के लिए दूसरे उपाय -- अगर ऐसे दूसरे उपाय हों तो ढूंढ़ेगा ही । मेरा कहना यह है कि हर कोई अपने- अपने विश्वास के अनुसार काम करे । कांग्रेसके मंचपर अनेक विचारोंके लिए स्थान इसका सिद्धान्त आश्चर्यजनक रूपसे सीधा और सरल है। कोई पूर्ण सहयोगी तथा ऐसा राष्ट्रवादी भी इसमें रहकर काम कर सकता है जो इस कार्यक्रममें परिवर्तन चाहता है । संस्थाके आदेशकी दलीलको हास्यास्पद सीमातक नहीं खींच ले जाना चाहिए और बहुमतके प्रस्तावोंका गुलाम नहीं बन-बैठना चाहिए। यह तो पशु-बलको और भी घातक रूपमें पुनः प्रतिष्ठित करना होगा । और अल्पमतवालोंके अधिकारों- का खयाल रखना है तो बहुमतवालोंको उनके विचार और कार्य के प्रति सहिष्णुता बरतनी चाहिए, उसका आदर करना चाहिए। ऐसा कोई कारण दिखाई नहीं देता कि राष्ट्रवादी लोग वकालत करने, अपने बच्चोंको सरकारी स्कूलोंमें भेजने और कौंसिलोंके लिए चुनाव लड़नेके बावजूद कांग्रेस में क्यों नहीं बने रह सकते । हाँ, इतना जरूर है कि जबतक वे कांग्रेसके बहुमतसे अपना विचार स्वीकार न करवा लें तबतक कांग्रेस के नामपर काम नहीं करें। इसका ध्यान रखना बहुमतवालोंका कर्त्तव्य होगा कि अल्पमतवालोंकी बात ठीकसे सुनी जाये और अन्य तरीकोंसे भी उन्हें अपमानित नहीं किया जाये। अगर व्यक्तियोंको अपनी निर्णय-बुद्धिको बहुमतकी मर्जीपर ही छोड़ देना पड़े तो स्वराज्य बिलकुल बेमानी चीज हो जायेगा । मैं सभी कांग्रेसी भाइयोंसे एक व्यक्तिगत अनुरोध करना चाहता हूँ । वे मेरी इस बातको सच मानें कि अगर इस कार्यक्रमके पक्षमें मत देनेवाले लोगोंने मेरे साथ हार्दिक सहयोग नहीं किया तो कलकत्ते में प्रारम्भ हुए इस आन्दोलनके नेता और प्रणेताके रूपमें मुझे अपना मार्ग बहुत ही विघ्न-बाधाओंसे भरा लगेगा। अगर इस कार्यक्रमके समर्थक लोग अल्पमत में हों तब भी मैं खुशी-खुशी और विश्वासपूर्वक विजयकी मंजिलकी ओर कूच कर सकूँगा । अगर दृढ़ता और धार्मिक निष्ठासे विरोध किया जाये तो यह सरकार एक जिलेके विरोध के सामने भी एक दिन नहीं ठहर सकती बशर्ते कि दूसरे उस तरहसे बीचमें न आयें जिस तरह बम्बई आ गया था । ईमानदार लोगोंकी संख्याको देखते हुए हमारे महान् देशमें अनेक दलोंके लिए भी गुंजाइश है। जिस तरह मैं चाहूँगा कि सभी संगठन उन सम्पूर्णतावादियोंके प्रति सहि- ष्णुता बरतें जो सरकारसे सारे सम्भव सम्बन्ध तोड़ लेना चाहते हैं, उसी तरह मैं ऐसे किसी कार्यक्षम और अच्छे संगठनका भी स्वागत करूंगा जो सरकारी संस्थाओंका उप- भोग करने में विश्वास रखते हैं और उनसे जिनता सन्तोष उन्हें मिल सकता हो उतना प्राप्त करना चाहते हैं । कोई कारण नहीं कि जो प्रान्त जनताको अपने साथ लेकर चल सकता हो वह इन दोमें से किसी भी एक आधारपर अपना संगठन न करे । Gandhi Heritage Portal