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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/६०५

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भारतीय अर्थशास्त्र ५७३ म सरकारको इस बातके लिए सचमुच दोषी ठहराता हूँ कि शरारत शुरू हो जानेके बाद मोपलाओंके अत्याचारोंसे हिन्दुओंकी रक्षा करनेके बदले वह मोपलाओंको दण्ड देनेमें ही लगी रही। यदि ये अत्याचार हिन्दू परिवारोंके बदले अंग्रेज परिवारोंपर हो रहे होते, तो भी क्या सरकार इतनी ही ढिलाईके साथ काम करती ? यदि ये तथाकथित विद्रोही लोग मोपला न होकर अंग्रेज होते, तो भी क्या सरकार उनके साथ इतनी ही अमानवीयता बरतती ? मुझे खेदपूर्वक यही कहना पड़ता है कि सरकारने हिन्दुओंकी रक्षा करने और मोपलाओंके साथ मानवीयताका बरताव करनेके अपने दोनों ही कर्त्तव्योंके प्रति अपराधपूर्ण उपेक्षा दिखाई है। [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, ८-१२-१९२१ २३२. भारतीय अर्थशास्त्र एक मित्रने भारतीय वस्त्र-व्यवसायपर एक विवरण पुस्तिका (बुलेटिन) मुझे दी जिसे भारत सरकारके आदेशपर श्री एस० सी० काओम्रो, सी० बी० ई०ने तैयार किया था। इसमें पूर्व-कथनके रूपमें निम्नलिखित टिप्पणी दी हुई है : सरकार चाहती है कि इस विवरणिकामें प्रस्तुत विवरण या विचार स्वयं लेखकके ही माने जायें।" यदि ऐसा है तो सरकार इस प्रकारके प्रकाशनोंपर धन व्यर्थ खर्च करके कर- दाताओंपर और अधिक बोझ क्यों डालती है ? यह जो मेरे सामने पुस्तिका है वह इस मालाकी १६वीं पुस्तिका है। क्या सरकार प्रश्नके दोनों पक्ष पेश करती है ? प्रस्तुत विवरणिकाका मंशा स्वदेशी आन्दोलनका उत्तर देना है। इसमें विभिन्न तालिकाओं द्वारा देशमें आयात किये गये तथा निर्मित वस्त्रोंपर जिनमें हाथका बुना कपड़ा भी शामिल है, प्रकाश डाला गया है। किन्तु इससे पाठकको आन्दोलनके अध्य- यनमें कोई सहायता नहीं मिलती । अध्यवसायी लेखकने वर्तमान आन्दोलन अथवा उसके क्षेत्रका अध्ययन करनेका कष्ट नहीं उठाया । भारत सरकार इस देशमें चलनेवाले इस रचनात्मक तथा सहकारी आन्दोलनको इतनी तिरस्कारपूर्ण दृष्टिसे देखती है और जनताके धनको उसके एक सद्भावनापूर्ण अध्ययन और विवेचन के बदले व्यर्थ के खण्डन- मण्डनके प्रयासोंपर खर्च करती है । जिस व्यवस्थाके अन्तर्गत यह सब उसकी भर्त्सना इससे बढ़कर और क्या हो सकती है ? लेखकका तर्क है कि : किया जाता १. यदि आन्दोलन सफल होता है, तो इससे खादीको संरक्षण नहीं मिलेगा, उससे केवल विदेशी वस्त्रोंका निषेध ही होगा । २. इससे केवल भारतके पूंजीपतियोंको ही लाभ होगा तथा उपभोक्ताओंको हानि होगी । Gandhi Heritage Portal