साल-भरका वादा ५८७ यह अवश्य ठीक है कि मैंने आशा इससे अधिक की थी। मैंने सोचा था कि हम इस वर्ष में न केवल स्वराज्यका मार्ग देख लेंगे, बल्कि स्वराज्यकी प्रतिमा भी हमारे सामने आकर खड़ी हो जायेगी; हम शासन-कर्त्ताओंके साथ सुलह कर लेंगे, असहयोग समाप्त हो जायेगा तथा शुद्ध सहयोग शुरू हो जायेगा । पर अब मुझे डर है कि इन शेष दिनोंमें हम शायद इस स्थितिका अनुभव न कर सकें। बल्कि, इसके विपरीत हमारे असहयोगका वेग और भी तीव्र हो जायेगा और ऐसा मालूम होगा कि मानो अब सहयोग होनेकी सम्भावना ही नहीं रही । परन्तु यही अनुभव सहयोगको नजदीक लानेवाला होगा। प्रभात के पहलेका अन्धकार घोरतम होता है । प्रसूतिके पहलेकी वेद- नायें असह्य होती हैं और इसलिए स्वयं प्रसवके ही विषयमें माँको सन्देह उत्पन्न होने लगता है । उसी प्रकार हमारा प्रसूतिकाल भी कठिन से कठिन होगा । बम्बईने उसमें विघ्न डाल दिया । हमने स्वेच्छासे जो जोर लगाना चाहा था, हमने स्वयं अपने ऊपर दुःख झेलनेकी जो प्रतिज्ञा की थी, बम्बईने उसका द्वार बन्द कर दिया। परन्तु सौभाग्यसे सरकारने हमारे लिए अधिक कर्तृत्व करने, अधिक दुःख भोगनेका दरवाजा खोल दिया है। उसने दमनका वेग बढ़ा दिया है। यदि हम निर्भय होकर इस सिंहद्वारमें प्रवेश कर जायें तो स्वराज्यकी प्रतिमाके हमारे सम्मुख आकर खड़ी होने में देर नहीं लगेगी। पर अभी मैं निश्चयपूर्वक यह क्यों नहीं कह रहा हूँ कि इस वर्ष में स्वराज्य- की प्रतिमा खड़ी हो ही जायेगी ? इसलिए कि मुझे भविष्य ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है । मैं त्रिकालदर्शी नहीं हूँ । मुझे दिखाई नहीं देता, मैं तो केवल श्रद्धालु हूँ। मैं ईश्वरको सर्वशक्तिमान मानता हूँ। हमारे हृदयमें वह कब कोई बड़ी उथल-पुथल कर डालेगा, यह कौन कह सकता है ? १७ नवम्बरको जिस समय मैं आशाकी बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था उसी समय निराशाजनक घटनाएँ घट रही थीं, इसकी मुझे क्या खबर थी ? और अब जब कि मुझे भी इतने दिनोंमें प्रतिमा खड़ी हो जानेमें सन्देह है, यदि ईश्वर वह प्रतिमा तैयार कर रहा हो तो मैं क्या जानूँ ? जिस प्रकार मैं वैद्य हूँ, उसी प्रकार मैं रोगी भी हूँ। जो स्वराज्य मुझे लेना है उसे मैं ले नहीं पाया । मुझे रास्ता मिल गया है और मैं उसे हर्गिज नहीं छोडूंगा। मेरा स्वराज्य तो बहुत दूर है । पर इसी महीने में मैं उसे पा जाऊँ तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। मैं पाठकोंको निस्सन्देह यह विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने अपने प्रयत्नमें कोई कोर-कसर नहीं रख छोड़ी है । मेरी तो यही धारणा है कि भारतके लिए स्वराज्य प्राप्त करनेके प्रयत्नमें ही मेरा मोक्ष है । यदि मुझे ऐसा मालूम होगा कि मोक्ष प्राप्त करनेके बजाय मैं बन्धन- में जकड़ा जा रहा हूँ, चढ़ने के बजाय गिर रहा हूँ, तो फिर मैं हिमालय चल देने में रोके नहीं रुकूंगा । अभीतक तो मुझे ऐसा नहीं मालूम होता कि मैं अधिक बँधता जा रहा हूँ। जनवरीकी पहली तारीखको मेरे मनकी दशा कैसी होगी, यह मैं निश्चय ही नहीं जानता। इससे पाठक समझ गये होंगे कि स्वराज्य मेरी साधना है, मेरे मोक्षका द्वार है । मेरा आन्दोलन केवल स्वार्थमूलक है और ऐसा ही रहेगा। एक दृष्टिसे, मैं यह नहीं चाहता कि इस वर्ष के भीतर स्वराज्यकी प्रतिमा खड़ी हो जाये। मैं अपने बारेमें सभी प्रकारके भ्रमसे बचना चाहता हूँ । मैं लोगोंको यह Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/६१९
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