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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/६२२

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५९० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय होगी। आज हमें जितना उद्यम करना पड़ता है, आज जितना उत्तरदायित्व हमारे सिरपर है, उतना ही उद्यम हमें तब भी करना पड़ेगा, उतना ही उत्तरदायित्व हमारे कन्धोंपर तब भी होगा । तब भी हम ढेढ़ और भंगीका स्पर्श करेंगे, उनपर प्रेमभाव रखेंगे। आज हम जो करते हैं वह सब सोच-समझकर करें और यह मानकर करें कि यह हमेशा के लिए है; ऐसा करनेपर ही हममें योग्यता आयेगी । मैं मानता हूँ कि बारडोली ताल्लुकेमें यह सब करने की पूर्ण शक्ति है । जो कुछ अधूरा रहा सो कुछ तो समयकी तंगी के कारण और कुछ अधूरी समझ के कारण । इस लिए मैं बिलकुल ही निराश नहीं हुआ हूँ, लेकिन ऐसा मानता हूँ कि समस्त त्रुटियोंको थोड़े ही समय में दूर करके लोग सविनय कानून-भंग करनेकी पूर्ण योग्यता प्राप्त करेंगे । जिन ' सहयोगियों' से मैं मिला हूँ उन्होंने भी इस बातकी गवाही दी है कि सारा काम शान्तिपूर्वक हुआ है और कहा है कि छ: महीनोंमें बारडोली ताल्लुका तैयार हो जायेगा । ताल्लुकेके प्राणरूप भाई कुंवरजी मानते हैं कि वे एक मासमें कातने- बुनने का तथा दूसरा काम पूरा कर सकेंगे । सम्भव है कि दोनोंके कथनमें जाने-अनजाने कुछ अतिशयोक्ति हो । लेकिन बारडोली के भले स्त्री-पुरुषोंने मेरे ऊपर यह छाप जरूर डाली कि वे थोड़े ही समय में योग्यताका प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेंगे । सबसे सुन्दर बात तो मुझे यह दिखाई दी कि काम करनेवाले लोगोंमें सिर्फ युवक ही नहीं बल्कि बुजुर्ग लोग भी हैं। स्त्रियाँ भी दिलचस्पी लेती हैं। स्वयंसेवक बिना पैसेके काम करते हैं । जो रुपया-पैसा खर्च होता है वह सब बारडोलीमें से ही पूरा किया जाता है । इसलिए जागृति सारे ताल्लुकेकी ही मानी जायेगी, उसके अमुक वर्ग- की नहीं । बारडोलीका उत्तरदायित्व अब बढ़ गया है। बारडोलीने ही मुझे दिल्लीमें सविनय अवज्ञाकी योजनाको स्पष्ट स्वरूप प्रदान करनेके लिए प्रेरित किया। इससे अन्य प्रान्तोंमें भी उत्साह बढ़ा, इसीके परिणामस्वरूप हमारे कई महान् योद्धा आज जेलमें बिराज रहे हैं । इस तरह उत्साहका निमित्त बनने के बाद बारडोली चुपचाप नहीं बैठा रह सकता। बारडोलीको एकदम पूर्ण आत्मशुद्धि करनी होगी और उस शुद्धिके लिए महान पुरुषार्थ करना होगा । लोग विचारपूर्वक काम, काम और सिर्फ काम ही करते रहें और यदि उनका सच्चा हृदय परिवर्तन हो गया हो तो जिस प्रयत्नकी जरूरत है, उसे करना कठिन नहीं होगा । पाठक देखेंगे कि लोगोंमें दुःख सहन करनेकी, जेल जानेकी और गालियाँ खानेकी ताकत है या नहीं मैंने इस बातकी चर्चा ही नहीं की है। मैंने किसीसे पूछा भी नहीं । -- है । मेरा अनुभव है और मेरा विश्वास है कि जब मनुष्य अपने कर्त्तव्यका पालन करता है तब उसमें दुःख सहन करनेकी शक्ति तुरन्त आ जाती है। बारडोलीके लोग तो जेल जानेकी योग्यता प्राप्त करनेकी खातिर इतना प्रयास कर रहे हैं तो फिर मैं यह प्रश्न करके कि उनमें जेल जानेकी शक्ति है या नहीं, उनका अपमान कैसे कर सकता हूँ ? यह समय ऐसा है कि जेल जाना कठिन है; जेल न जाना ही आसान है । जो व्यक्ति सूत नहीं कातता, खादी नहीं पहनता, ईमानदार नहीं है, विनयशील नहीं है, सबके साथ द्वेष करता है, ढेढ़ और भंगीका स्पर्श नहीं करता उसे जेल जानेके लिए Gandhi Heritage Portal