दस उन्होंने किसी धार्मिक पत्र लेखककी आपत्तियोंका जवाब दिया है। पत्र लेखकका कहना था कि गांधीजी अपने लेखों में केवल 'राम' इत्यादि लिखकर श्री रामचन्द्र प्रभुका उल्लेख करते हैं, यह अनुचित है । यद्यपि गांधीजी सदैव यही कहते थे कि ईश्वर सत्य और सत्य ही ईश्वर है, और यद्यपि वे अपने नैतिक आदर्शोंका आधार निर्गुण भगवान्को ही मानते थे तथापि उनके अन्तरमें सगुण भक्तिकी धारा बहती रहती थी जो उन्हें बचपन में अपने आसपास व्याप्त वैष्णवी वातावरणसे प्राप्त हुई थी। राम उनके इष्टदेव थे । “राम तो अब मेरे घर आ गये हैं । उन्हें अगर मैं 'तुम' या 'आप' कहूँ तो वे मुझपर रोष करेंगे। मेरे न माँ है, न बाप है और न भाई, ऐसा आश्रयविहीन हूँ मैं। मेरे तो अब राम ही सर्वस्व हैं। ... मैं तो उसीके जिलाये जी रहा हूँ । मैं उसी रामको भंगी और ब्राह्मणमें देखता हूँ । इसलिए दोनोंका अभिवादन करता हूँ । (पृष्ठ २०१-२) एक तर्कनिष्ठ व्यक्ति होने के कारण यद्यपि गांधीजी यह मानते और कहते भी थे कि राम, खुदा और गॉड एक ही तत्त्व- को सूचित करते हैं, फिर भी स्वाभाविक रूपसे उनका मन अपने प्रिय रामका नाम लेकर ऐसी प्रेरणा पाता था कि वे उस नामके जादूके विषयमें लिखते हुए कभी थकते नहीं थे । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 24.pdf/१६
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