६०२ -- सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय में किये जायें या विभिन्न दिशाओंमें, पर नौकरशाहीको करारा जवाब हमारे सम्मिलित प्रयत्नोंसे ही मिलेगा • वह नौकरशाही जो भारतीय जनताके अधिकारों और उनकी स्वतन्त्रताको मान्यता नहीं देना चाहती। हम जोर देकर स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि एक ही लक्ष्यको सामने रखकर एक या अलग-अलग क्षेत्रोंमें काम करनेका हमारा यह संकल्प समूचे भारत देशका संकल्प है कि हम स्वराज्य के संघर्षको सफल बनाकर ही दम लेंगे । [ अंग्रेजीसे ] वायस ऑफ फ्रीडम परिशिष्ट ३ डा० भगवानदासका पत्र बनारस ५ जून, १९२४ सम्पादक 'यंग इंडिया' प्रिय महोदय, लाखों अन्य पाठकोंकी भाँति, मैंने भी 'यंग इंडिया' के २९-५-१९२४ के अंक में हिन्दू-मुस्लिम तनाव : कारण और उपचार" शीर्षक लेखमें किये गये आपके गुरु- गम्भीर तर्कोको अत्यन्त सावधानी के साथ और पूरे ध्यानसे पढ़ लिया है। उसमें अनेक सुविदित सचाइयों (जिनको जनताने अभीतक उतनी गहराईसे नहीं समझा था) को सुबोध, सहज और सुन्दर ढंगसे स्पष्टवादिताके साथ प्रस्तुत किया गया है । अब आपकी अत्यन्त ही विश्वसनीय सत्यनिष्ठासे प्रमाणित हो जानेपर इन सचाइयोंको (अनुवाद होनेपर) लाखों लोग इनको पूरी गहराईके साथ समझ लेंगे, जो वे अबतक नहीं कर पाये थे । पर मुझे लगता है कि इस समस्याका निदान अधिक गहराईसे करने और इसके उपचार के लिए अधिक उग्र किस्मका नुस्खा तलाश करने की जरूरत है। मैं इसीलिए पादटिप्पणी में कही गई आपकी बातके मुताबिक आपकी कुछ उक्तियों के सम्बन्धमें कुछ प्रश्न उठा रहा हूँ । आशा है कि आप इनका और अधिक विशद निरूपण करेंगे । (१) आपने पृष्ठ १७६१ पर कहा है : "मेरे निजी अनुभवसे भी इस मतकी पुष्टि होती है कि मुसलमान आम तौरपर धींगाधींगी करनेवाला और हिन्दू दब्बू होता है । क्या यह बात हमेशा और हर जगह आम तौरपर लागू होती है ? और यदि यह बात हमेशा ही या कभी-कभी ही ऐसी है तो क्यों है ? २. यहाँ यंग इंडियाको पृष्ठ संख्याका हवाला दिया गया है । Gandhi Heritage Porta
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 24.pdf/६३२
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