६०४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय आजके हिन्दू धर्मसे स्पष्ट ही कुछ मामलोंमें बेहतर है । यदि इस्लाममें मारकाट कुछ कम होती और उसका दार्शनिक पक्ष अधिक सबल होता तो वह हिन्दू धर्मके सभी अधिक उन्नत स्वरूपोंके समान ही अच्छा होता और निचले किस्म के हिन्दू धर्मके सभी स्वरूपोंसे तो निश्चित रूपसे अच्छा ही होता । 33 (२) आपने पृष्ठ १८३ पर कहा है : " अगर हिन्दू अपना घर सँभाल लें तो मुझे तनिक भी सन्देह नहीं कि इस्लाम में भी उसकी उदार परम्पराओंके योग्य प्रतिक्रिया अवश्य दिखाई देगी । हिन्दुओंको भीरुता या बुजदिली छोड़ देनी चाहिए । कृपया हिन्दुओंको जरा अधिक स्पष्ट शब्दों में बतलाइए कि वे अपने अन्दरकी बुराइयाँ कैसे दूर करें, बुजदिलीको कैसे छोड़ें। क्या हिन्दू धर्मके व्यावहारिक स्वरूपमें, उसके मर्ममें व्याप्त व्याधि ही आज उसके पतनका मूल कारण नहीं है; यह चौकाबन्दीकी मनोवृत्ति ही उसकी मूल व्याधि नहीं है ? बनारस के कई पण्डितोंने जबरन मुसलमान बनाये गये मलाबारके हिन्दुओंको फिरसे हिन्दू बनानेकी मंजूरी देनेकी व्यवस्थापर हस्ताक्षर करनेसे इनकार कर दिया था । उन लोगोंको इस्लाम- की छूत लग गई थी, और इसलिए उनको सदाके लिए हिन्दू धर्मसे अलग मान लिया गया था। यदि मैं पड़ोसीके नौकरको अपने यहाँ बुलाना चाहूँ, और अगर मेरे छू देने- भरसे वह मेरे पड़ोसीके बिलकुल कामका न रह जाता हो, और इस प्रकार मुझे मिल सकता हो तो मैं उसे अवश्य ही छू दूंगा । उसे छू देनेका मुझे बड़ा प्रबल प्रलोभन होगा ! हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जैसे झगड़े-फसाद होते हैं, वैसे ईसाइयों और मुसलमानों के बीच क्यों नहीं होते ? सच तो यह है कि ईसाई लोग मुसलमानों और हिन्दुओं दोनों ही को ईसाई बना लेते हैं, फिर भी मुसलमान उनसे इतने नाराज नहीं होते जितने कि वे हिन्दुओंके शुद्धि और संगठन सम्बन्धी कार्योंपर नाराज होते हैं। ऐसा क्यों ? आपने पृष्ठ १८० पर बिलकुल ठीक कहा है कि असलमें शुद्धि और संगठनका तरीका उनका अपना प्रदर्शन, गाजे-बाजे और ढोल पीटना इत्यादि ही झगड़े की जड़ हैं । यदि हिन्दुओंमें, विशेषकर हिन्दू पुजारियोंमें थोड़ी ज्यादा समझदारी हो, ईमानदारी और सहजबुद्धि हो और वे पाखण्डपूर्ण दिखावे और आत्मघाती धूर्तताका सहारा थोड़ा कम लें तो वे केवल इतना कह सकते हैं कि जो भी चाहे अपने-आपको हिन्दू कह सकता है और मिलते-जुलते खानपान, स्वभाव और तौर- तरीकोंवाले किसी भी हिन्दूके साथ बैठकर भोजन कर सकता है। फिर कोई झगड़ा ही नहीं रह जायेगा । यदि वे मात्र स्पर्शसे दूषित होनेवाली पवित्रताके इस दम्भको एलानिया छोड़ दें तो फिर जैसे-तैसे हिन्दुओंका धर्म-परिवर्तन कराने के लिए मुसल- मानोंको न तो कोई प्रेरणा रह जायेगी और न कोई आवेश ही ( और देखा जाये तो यह दम्भ अपने-आपमें बहुत ही अशक्त और कायरतापूर्ण है, क्योंकि वह अपने स्पर्शसे दूसरोंको शुद्ध करनेकी बजाय दूसरोंके स्पर्श-मात्रसे अशुद्ध और नष्ट हो जाता है) । इस दम्भका त्याग कर देनेपर मुसलमान और हिन्दू लोग फिरसे आपसमें मुक्त और मैत्रीपूर्ण मानवोंकी तरह बरताव करने लगेंगे। जब वे यह समझ लेंगे या कमसे कम महसूस कर लेंगे कि सभी लोग समान हैं । वे सबसे पहले इन्सान और Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 24.pdf/६३४
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