६०६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय (५) आपने पृष्ठ १७९ पर लिखा है: “हम सब एक-दूसरेकी अनुकूल बातें खोजकर ... काम करें।" अनुकूल बातोंका आप क्या अर्थ लगाते हैं? क्या दो व्यक्तियोंके बीच स्वभाव, रुचि, आदतों इत्यादिके आधारपर व्यक्तिगत मैत्री स्थापित करनेके उद्देश्यसे सम्पर्क; या दोनों सम्प्रदायोंके आधारपर सामाजिक सुविधाओंके लिए सम्पर्क; या राजनीतिक दलोंके बीच राजनीतिक गठबंधनके लिए सम्पर्क; या आप धर्मोके बीच वास्तवमें एक गहरी, स्थायी एकता और संघबद्धताके लिए सम्पर्क स्थापित करना चाहते हैं ? (६) पृष्ठ १८२ पर आपने विभिन्न राजनीतिक मामलोंके निबटारे के लिए हकीम अजमल खाँ के हाथमें कलम सौंप देने " की बात कही है। आपने सिर्फ उन्हींके नामका उल्लेख क्यों किया ? क्या इसका कारण यह नहीं कि आप जानते हैं, या कमसे कम महसूस करते हैं (जैसा कि कुछ अन्य लोगोंने भी महसूस किया है) कि हकीम साहब इन्सान पहले और मुसलमान बादमें हैं, कि वे एक भले, न्यायप्रिय और उदारचरित मनुष्य हैं और (शायद इसीलिए कि वे ) धर्मके मामलेमें कट्टरपंथी हैं ? भगवान् न करे, पर मान लीजिए कि वे अशक्त हो जायें तो क्या आप उनके स्थानपर अन्य कई नाम सुझा सकते हैं ? और क्या इन राजनीतिक समस्याओंके निव- टारेका बस एक यही, इतने जोखिमका रास्ता रह गया है कि एक ही मनुष्यको सारी जिम्मेदारी सौंप दी जाये, वह भी एक ऐसे मनुष्यके हाथमें जिसकी सेहत ठीक नहीं रहती, भले ही दोनों सम्प्रदायोंके लोगों की नजरोंमें उसका दर्जा ऐन आपके बाद ही हो ? क्या इसका कोई दूसरा अधिक निरापद और समुचित मार्ग नहीं रह गया है ? क्या ऐसे स्त्री-पुरुषोंकी एक कोई संस्था किसी भी तरह खड़ी नहीं की जा सकती और उसके सदस्योंकी संख्याको लोक संसदके सदस्यों, विधान सभाओंके सदस्यों, पंच अदालतों और सर्वोच्च अखिल भारतीय पंचायत के सदस्यों में से लोगोंका चुनाव करके एक सुसंगत स्तरपर कायम नहीं रखा जा सकता ? - (७) पृष्ठ १८२ पर आप कहते हैं: " हिन्दू-मुस्लिम एकताका मतलब ही स्वराज्य है । जबतक इस अभागे देशमें हिन्दुओं और मुसलमानोंके बीच हार्दिक और स्थायी एकता कायम नहीं होती तबतक मुझे तो कोई रास्ता दिखाई नहीं देता । और हरएक आदमी यही बात कहता है । परन्तु हम ऐसी एकता स्थापित कैसे करेंगे ? क्या दोनों सम्प्रदायोंके लोगोंसे बार-बार यही कहकर कि एक हो जाओ एक हो जाओ; आपसमें लड़ो मत; तुम गोवधपर और तुम गाजे-बाजेपर आपत्ति मत करो ? ऐसा क्यों है कि सोते-जागते ऐसी ताकीदोंके बाद भी लोग एक नहीं होना चाहते, आपस में लड़ते रहते हैं और एक-दूसरेके कामोंपर आपत्ति करते रहते हैं और सचमुच यह प्रवृत्ति दिन- दिन बढ़ती जा रही है ? क्या आप इस बात से सहमत नहीं कि सम्पर्क स्थापित करनेके मुद्दों या कहिए कि सभी धर्मोके समान तत्त्वोंको सार्वजनिक तौरपर अधिक स्पष्ट शब्दों में अधिक प्रयत्नपूर्वक बार-बार बतलाना कहीं ज्यादा कारगर साबित होगा ? [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १९-६-१९२४ Gandhi Heritage Porta
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 24.pdf/६३६
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