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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६७५

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परिशिष्ट परिशिष्ट १ बोलशेविज्मपर मानवेन्द्रनाथ रायके विचार महात्मा गांधी के कुछ अमेरिकी मित्रोंने उन्हें लिखा कि धमके नामपर आप भारतमें शायद बोलशेविज्मको दाखिल कर रहे हैं। ये ख्वामखाह "मित्र" बननेवाले लोग, स्पष्ट ही आंग्ल-सैक्सन साम्राज्यवादके पक्षधरोंसे (जो अकसर दुनिया के सामने अपने को शान्तिवादियों के बानेमें पेश करते हैं) प्रेरणा लेकर, मुसलमान जातियोंके विद्रोहको विश्वके लिए एक भारी खतरा बताते हैं, क्योंकि इस विद्रोहको बोलशेविक रूसका समर्थन प्राप्त है। महात्माजी चाहते तो बड़ी आसानीसे इस उद्धततापूर्ण पत्रका मुनासिब जवाब दे सकते थे । वे अपने “ जिम्मेदार (?) विदेशी मित्रों" से कह सकते थे कि मुसलमान जातियोंके पास विद्रोह करनेके उचित कारण हैं, और इस विद्रोहका समर्थन करनेवाला कोई भी राजनीतिक सिद्धान्त या सरकार स्वतन्त्रताके तमाम पक्षधरोंकी दृष्टिमें सम्मानकी पात्र होनी चाहिए। इसके अलावा वे अपने अमेरिकी मित्रोंसे यह भी कह सकते हैं कि अगर सचमुच आपको इस विद्रोहमें विश्व के लिए कोई बहुत बड़ा खतरा दिखाई देता है तो कृपा कर अपने यहाँ उसका कुछ उपाय करिये । दुनियाको आज अमेरिकी साम्राज्यवाद से ज्यादा खतरा और किस चीजसे है ? क्या मुसलमान जातियोंका विद्रोह 'कू-क्लक्स-क्लान" और 'अमेरिकन लीजन' से भी ज्यादा खतरनाक है ? क्या बोलशेविकोंका अनीश्वरवाद अमेरिकी लोकतन्त्रकी एशिया - विरोधी भावनासे भी अधिक अधर्ममय है ? किन्तु, महात्माजी ने ऐसा दो टूक जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपने दृष्टिकोणका औचित्य सिद्ध करना उचित समझा। कोई उनपर बोलशेविक प्रवृत्तिका सन्देह न कर सके, उन्होंने इसकी पेशबन्दी कर डाली । किन्तु, विचित्र बात यह है कि यद्यपि स्वयं अपने कथनके अनुसार वे बोलशेविज्म के विषय में कुछ नहीं जानते, फिर भी वे दुनिया के सामने यह सिद्ध करनेके लिए अत्यन्त उत्सुक थे कि इसके प्रति उनका कोई रुझान नहीं है । उनकी सहज बोलशेविज्म-विरोधी भावना इतनी प्रबल है । 'यंग इंडिया' में अपने एक लेख में वे कहते हैं कि " सबसे पहले तो मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मुझे पता नहीं, बोलशेविज्मके मानी क्या हैं।" यह तो उनकी प्रतिष्ठाको बहुत आँच पहुँचानेवाली स्वीकारोक्ति है, क्योंकि यह स्वीकारोक्ति उस व्यक्तिकी है जो एक बहुत बड़े जन- आन्दोलनका नेतृत्व कर रहा है। उसी लेखमें महात्माजीने यह भी कहा कि वे जानते हैं कि इस मामले में दो परस्पर विरोधी पक्ष हैं -- “एक तो उसका बड़ा भद्दा और १. गृह-युद्ध के बाद स्थापित संयुक्त राज्य अमेरिकाके दक्षिणी राज्योंकी नीग्रो-विरोधी गुप्त समिति । Gandhi Heritage Portal