परिशिष्ट ६४१ तो वे निष्प्राण शब्द-भर रह जाते हैं । महात्माजीने खुद कहा है कि वे जनसाधारणको पूँजीवादके प्रभुत्वसे मुक्त देखना चाहते हैं । स्वयं बोलशेविज्म इससे कोई अधिक भयं- कर लक्ष्य लेकर कहाँ चल रहा है ? बोलशेविक लोग भी महात्माजी के इस कथन से सामान्यतः सहमत हैं कि "दुनियाका सबसे बड़ा संकट तो आज वह साम्राज्यवाद है, जो दिनपर-दिन अपने पैर फैलाता जाता है, दुनियाको लूटता जाता है, जो किसीके प्रति जिम्मेवार नहीं है, और जो तमाम निर्बल जातियों के स्वतन्त्र अस्तित्व और विकास के लिए खतरा उपस्थित कर रहा है।" लेकिन महात्माजी और बोलशेविकों के बीच अन्तर यह है कि जहाँ महात्माजी स्वतन्त्रता के इस सिद्धान्तको नैतिकता, धर्म और ईश्वरकी जटिल कल्पनाके सामने गौण बनाकर उसे समस्त व्यावहारिक महत्त्वसे वंचित कर देते हैं, वहाँ बोलशेविक लोग अपनी दृष्टिपर इस प्रकारके भ्रमों का पर्दा नहीं चढ़ने देते और दुनिया जैसी है, उसके साथ वैसा ही बरतते हैं। नतीजा यह है कि जहाँ बोलशेविज्म इन साम्राज्यवादी शक्तियोंके संयुक्त और दृढ़ विरोधके बावजूद अपना रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ता है और युगों पुरानी दासताकी फौलादी बेड़ियों की कड़ियाँ एकके बाद एक तोड़ता जाता है, वहाँ गांधीवाद अन्धेरेमें हाथ-पाँव मार रहा है। और ऐसे नैतिक तथा धार्मिक विधानोंकी सृष्टि करता जा रहा है, जो जन साधारण- की अपनी स्वतन्त्रता के लिए लड़नेकी संकल्प-शक्ति के सिर्फ आड़े ही आते हैं । इतना तो माना ही जा सकता है कि महात्माजी समाजवाद के सामान्य सिद्धान्तों से परिचित हैं । यहाँ मेरा मतलब सेंट साइमन, टामस मूर, टाल्स्टाय, आदिके अव्यवहार्यं समाजवादके सिद्धान्तोंसे नहीं, बल्कि कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा वस्तुस्थितिकी वास्तविक जानकारी और आर्थिक तथ्यों के आधारपर रचे समाजवादके सिद्धान्तोंसे है । ये सिद्धान्त इस प्रकार हैं : (१) उत्पादनकी पूँजीवादी प्रणालीका उच्छेद; (२) वैयक्तिक सम्पत्तिकी समाप्ति; (३) सामाजिक स्वामित्व के आधारपर उत्पादन और वितरण के साधनों का पुनर्गठन; और (४) वर्गों में विभाजित समाजका बन्धुत्वकी भावनासे युक्त मानव-परिवार में रूपान्तर । यही सब सिद्धान्त बोलशेविज्म के भी हैं, क्योंकि समाज- वादकी उम्र और विजयगामी प्रारम्भिक अवस्थाका नाम ही बोलशेविज्म है। 'बोलशेविज्म' शब्दको रक्तपात, विनाश, आतंक आदिके साथ जोड़ दिया गया है, लेकिन उसका असली अर्थ बिलकुल निर्दोष है । बोलशेविज्म रूसी शब्द 'बोलशेविकी ' से बना है और बोलशेविकीका अर्थ है बहुसंख्यक पक्षके अनुगामी । इस शब्दका प्रयोग पहले-पहल तब हुआ था, जब सन् १९०३ में कार्यक्रम और कार्य-प्रणाली के सवालपर रूसकी सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी दो टुकड़ों में बँट गई थी । लेनिन और कुछ दूसरे लोगों के नेतृत्व में चलनेवाले बहुसंख्यक दलके कार्यक्रम और कार्य-प्रणालीका नाम बोलशेविज्म पड़ गया । और चूंकि रूस के सर्वहारा वर्गने अक्तूबर, १९१७ में जो विजय प्राप्त की, वह उसी कार्यक्रम और कार्य-प्रणाली के अनुसार लड़कर प्राप्त की जिसकी वकालत बहुसंख्यक दल १९०३ से ही करता आ रहा था, इसलिए अक्तूबर क्रान्तिको बोलशेविस्ट विजय कहा जाता है । यह बोलशेविस्ट विजय समाजवाद की पहली विजय है। अब हम देखें कि रूसी क्रान्तिके ठोस परिणाम क्या हैं : (१) एक भ्रष्ट, गैरजिम्मे- २५-४१ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६७७
दिखावट