६४४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय जनसाधारणको धर्म द्वारा बुने अज्ञानके जालसे मुक्त करने के लिए नास्तिकताका प्रचार अवश्य करेगा । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १-१-१९२५ मानवेन्द्रनाथ राय परिशिष्ट २ चरखेके सम्बन्धमें च० राजगोपालाचारीकी टिप्पणीका अंश अपरिवर्तनवादियों को, जिन्हें लगता है कि देशकी मुक्तिका मार्ग, हमारी आशाका स्थायी आधार, चरखा ही है, इधर-उधरकी कोई चिन्ता किये बिना निष्ठा- पूर्वक अपना दायित्व निभाते चलना चाहिए। हमारे लिए न विश्रामका अवकाश है और न थककर बैठ जानेकी गुंजाइश । चरखा ही हमारी आशा है, हमारा आनन्द है, हमारा मित्र और नेक रहनुमा है । जागते हुए हमें इसीके लिए काम करते रहना चाहिए, सोते हुए इसीका स्वप्न देखना चाहिए। पहले मुझे इन बातों का मतलब पूरी तरहसे समझ में नहीं आया था । इसलिए मैं ऐसा समझता था कि महात्माजी ऐसी राह जा रहे हैं, जिसमें मुझे न कोई औचित्य दिखाई पड़ता था, न रोशनी । लेकिन, अब मैं चीज़ोंको बिलकुल स्पष्ट देख रहा हूँ और आशा करता हूँ कि जो लोग मेरी ही तरह अबतक शंकाग्रस्त और दिग्भ्रमित रहे हैं वे भी इन चीजोंको साफ-साफ देखेंगे। कातो, कातो, कातो और दूसरोंसे भी कतवाओ - यही हमारा एक मात्र मंत्र है, यही हमारा गायत्री जाप है । - किन्तु, जहाँ मुझे वस्तुस्थितिका सही भान हुआ, वहाँ यह भी लगा कि इस सबमें एक प्रकारकी अवास्तविकता भी है, सत्य के साथ किसी प्रकारका कोई राजनीतिक खेल खेला जा रहा है, जो सत्याग्रहकी योजनापर अपनी अशुभ काली छाया डाल रहा है । लेकिन, यहाँ मैं उस गुरुकी निर्णयबुद्धिपर निर्भर करता हूँ, जिसका सहज सत्यबोध मेरे सत्यबोधसे न जाने कितना बढ़-चढ़कर है। अतः मैं पूर्णतः निश्चिन्त हूँ । [ अंग्रेजी से ] यंग इंडिया, १५-१-१९२५ राजगोपालाचारी Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६८०
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