सेवामें १३१. पत्र : बम्बई - सरकारको डर्बन मई ४, १९०१ माननीय आर० जे० सी० लॉर्ड [ बम्बई सरकार बम्बई ] [ प्रिय महोदय, ] मुझसे खास अनुरोध किया गया है कि मैं संलग्न पत्र' आपको भेज दूँ और नम्रता- पूर्वक सुझाऊँ कि भारतकी विभिन्न विधानपरिषदोंमें इस बाबत कुछ कार्रवाई की जाये । प्रवासियोंकी बहुत बड़ी संख्या बम्बई, मद्रास और कलकत्तेसे दक्षिण आफ्रिकाको भेजी जाती है। इस दृष्टिसे तो कोई कारण नहीं है कि स्थानिक सरकारें उन निर्योग्यताओंपर विचार न करें, जिनसे ब्रिटिश भारतीय पीड़ित हैं। फिर भी, अगर यह संभव न हो तो वाइसरायकी परिषदमें ही कार्रवाई की जाये । यह प्रश्न उनमें से है, जिनके बारेमें भारतीय और आंग्ल-भारतीय लोकमत एक है । और, मेरा खयाल है कि गैर-सरकारी सदस्योंकी संयुक्त कार्रवाई हमारी उद्देश्य-पूर्ति में बहुत सहायक होगी। इसमें बहुत कम शक है कि सरकारी पक्षकी सहानुभूति हमारे साथ होगी । और लॉर्ड कर्ज़नके रूपमें हमें जो जबरदस्त और सहानुभूतिशील वाइसराय मिले हैं, उनके शासनमें हमारी निर्योग्यताओंकी तहमें समाये प्रश्नका अनुकूल निबटारा हुए बिना रह नहीं सकता । लंदन टाइम्सने प्रश्नको इस प्रकार पेश किया है : क्या ब्रिटिश भारतीयोंको, जब वे भारत छोड़ते हैं, कानूनके सामने वही दर्जा मिलना चाहिए, जिसका उपभोग अन्य ब्रिटिश प्रजाएँ करती हैं? वे एक ब्रिटिश प्रदेशसे दूसरेको स्वतंत्रतापूर्वक जा सकते हैं या नहीं, और सहयोगी राज्यों में ब्रिटिश प्रजाके अधिकारोंका दावा कर सकते हैं या नहीं ? जरूरत इतनी ही है कि यह प्रश्न पर्याप्त रूपमें परमश्रेष्ठकी नजरमें ला दिया जाये । [ अंग्रेजीसे ] भारतमंत्रीके नाम भारत सरकारके खरीता नं० ३५, १९०१ का अंश । कलोनियल ऑफ़िस रेकर्ड्स : साउथ आफ्रिका, जनरल, १९०१ । १. अप्रैल २०, १९०१ का परिपत्र | बम्बई सरकारने गांधीजीका पत्र और उसके साथके कागजात भारत सरकारको भेज दिये थे, जिसने उन्हें भारतमंत्रीके पास भेज दिया । भारतमंत्रीके कार्यालयने उक्त पत्रमें एक टिप्पणी जोड़ दी । वह इस आशयकी थी कि प्रार्थनापत्रके सिलसिलेमें श्री चेम्बरलेनने उत्तर दे दिया है कि ट्रान्सवाल तथा ऑरेंज फ्री स्टेट उपनिवेशमें ब्रिटिश भारतीयोंकी मान-मर्यादाका प्रश्न लॉर्ड मिलनरके, जब वे दक्षिण आफ्रिका लौटें, विचारके लिए छोड़ रखा गया है । Gandhi Heritage Porta
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