पत्र: उपनिवेश सचिवको २०७ मोह था और उनमें मेरी भक्ति भी बहुत थी । वह सब गया । इसलिए मैं स्वार्थवश रोता हूँ । ऐसी हालत में आपको क्या धीरज बँधाऊँ । मूल गुजराती प्रति (सी० डबल्यू० २९३६) से । १३८. पत्र : उपनिवेश-सचिवको मोहनदास के प्रणाम १४, मर्क्युरी केन डर्बन मई २१, १९०१ सेवामें माननीय उपनिवेश सचिव पीटरमैरित्सबर्ग श्रीमन्, कारा त्रीकम नामके एक भारतीयकी थैली, जिसमें ४० पौंड थे, ६ तारीखको वेस्ट स्ट्रीटमें दिन-दहाड़े कुछ यूरोपीयोंने लूट ली थी । उनमें से एक आदमी पकड़ लिया गया था और १० तारीखको उसका कुछ मुकदमा हुआ था । जिस आदमीपर मुकदमा चला था वह जमानतपर छोड़ा गया था और वह जमानत जब्त हो गई थी। मैंने खुफिया पुलिसके दफ्तरमें अर्जी दी थी कि जमानतकी रकममें से ४० पौंड दे दिये जायें। मुझसे कहा गया कि मैं उसके लिए सरकारको लिखूं । अब मैं आवेदन करता हूँ कि जमानतकी रकममें से ४० पौंड मेरे मुअक्किलको दे दिये जायें । मेरे मुअक्किल के पास ४० पौंड थे, इस सम्बन्धमें जो प्रमाण मजिस्ट्रेटके सामने दर्ज किया जा चुका है, उससे ज्यादा भी किसी प्रमाणकी जरूरत हो, तो मैं सरकारके सामने पेश करनेको तैयार हूँ । [ अंग्रेजीसे ] पीटर मैरित्सबर्ग आर्काइव्ज़, सी० एस० ओ० ४२५८/१९०१ । आपका आज्ञाकारी सेवक, मो० क० गांधी Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/२४७
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