२६२. केप-प्रवासी भारतीय और सर पीटर फॉर हमारे केप-निवासी भाइयोंका एक शिष्ट-मण्डल माननीय उपनिवेश-सचिवसे हाल ही में मिला है। उसके नेता के तौरपर श्री गालिक जैसे सज्जनकी प्राप्ति और शिष्टमण्डलकी सफलतापर इन भाइयोंको हमारी बधाई है। सर पीटरका रुख निश्चित रूपसे सहानुभूतिपूर्ण था । उन्होंने केपके प्रवासी कानूनपर पुनर्विचार करने का वचन दिया है। यह भी आश्वासन दिया है कि ईस्ट लंदनकी नगर परिषदको वे राजी करनेका प्रयत्न करेंगे कि वह पटरीवाले कानूनका अमल प्रतिष्ठित भारतीयोंके विरुद्ध न करे और केपकी नगरपालिकाके बाजारोंवाले प्रस्तावको बिना उसपर अच्छी तरह विचार किये मंजूर न करे। ये सब शुभ लक्षण हैं। हमें तो निश्चय है कि यदि केप निवासी हमारे देशभाई नम्रतापूर्वक किन्तु लगातार अपनी आवाज उठाते रहेंगे तो उनको अवश्य राहत मिलेगी। केप टाइम्सने शिष्ट-मण्डल- सम्बन्धी अपने लेखमें स्वीकार किया है कि वे निःसन्देह उसके पात्र भी हैं। अगर केपकी संसद भारतकी महान् भाषाओंको मान्यता देनेका मार्ग प्रशस्त करती है तो हमारी रायमें वह साम्राज्यकी भारी सेवा है। इससे भारतीय जनताका क्षोभ बहुत कम हो जायेगा और प्रवासी कानूनके मूलभूत सिद्धान्तकी भी रक्षा हो जायेगी । ईस्ट लन्दन में पटरीवाले कानूनका लागू किया जाना एक बेमीजूँ बात है, यह हर कोई स्वीकार करेगा । इसलिए वह तो जितनी जल्दी हट जाये, उतना ही अच्छा है । डॉ० अब्दुल रहमानने इसके बारेमें एक बार बिलकुल ठीक ही कहा था कि अगर वे खुद पैदल-पटरीपर चलें तो ईस्ट लंदन में, वर्तमान नियमोंके मातहत, वे भी गिरफ्तार किये जा सकते हैं । [ अंग्रेजीसे ] इंडियन ओपिनियन, २५-६-१९०३ २६३. भारतीय प्रश्नपर श्री चेम्बरलेन हालमें जो तार समाचारपत्रोंमें छपे हैं, उनसे मालूम होता है, ब्रिटिश लोकसभा में एक प्रश्नके जवाब में श्री चेम्बरलेनने कहा है कि ट्रान्सवालके भारतीयोंकी यह शिकायत नहीं है कि उनके साथ शारीरिक दुर्व्यवहार किया जाता है, और न जोहानिसबर्गके ब्रिटिश भारतीय संघके अध्यक्षके पत्र में ही ऐसी कोई निश्चित बात बताई गई है। इन छोटे तारोंसे यह पता लगाना बड़ा कठिन है कि श्री चेम्बरलेनके उत्तरका अभिप्राय क्या है। यह बिलकुल सच है कि ट्रान्सवालके, बल्कि समस्त दक्षिण आफ्रिकाके, भारतीयोंने नियमपूर्वक शारीरिक दुर्व्यवहारकी कभी शिकायत नहीं की। हमारी शिकायतका आधार एशियाई -विरोधी कानून हैं। परन्तु यदि परम माननीय महानुभाव हाइडेलबर्गकी घटनाके सिलसिले में यह कहते हों कि जोहानिसबर्गके ब्रिटिश भारतीय संघ के अध्यक्षके पत्र में कोई निश्चित बात नहीं है, तो हम आदरके साथ इसका उत्तर देने को तैयार हैं । उक्त पत्रको हम पहले ही इन स्तम्भोंमें प्रकाशित कर चुके हैं। और हम यह दावेके साथ कह सकते हैं कि उस पत्रसे पूरी तौरसे प्रकट होता है कि कुछ भी सही, शारीरिक दुर्व्यवहार वहाँ हुआ जरूर है । परन्तु हम नहीं चाहते कि इस घटनापर अधिक विचार करें। क्योंकि हमारा यह दृढ़ मत है कि उस प्रकारकी वह एक अलग घटना थी और जब कभी ऐसी घटनाएँ १. देखिए “ पत्र: उपनिवेश सचिवको," भप्रैल २५, १९०३ । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/४१८
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