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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/५१८

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४७६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय पहुँचाने में कट जाये तब ( अगर हम कर सकें तो, मगर कर नहीं सकते) उन्हें अपने देश लौट जानेके लिए बाध्य करें और इस प्रकार उन्हें अपने पुरस्कारका सुख भोगने देने से इनकार कर दें ? और आप उन्हें भेजेंगे कहाँ ? उन्हें उसी भूखमरीकी परिस्थितिको झेलनेके लिए फिर क्यों वापस भेजा जाये, जिससे अपनी जवानीके दिनोंमें भागकर वे यहाँ आये थे ? अगर हम शाइलाकके समान एक पौंड मांस ही चाहते हैं तो, विश्वास रखिए, शाइलाकका ही प्रतिफल भी हमें भोगना होगा। आप चाहें तो भारतीयोंका आगमन रोक दें। अगर अभी खाली मकान काफी न हों तो अरबों या भारतीयोंको, जो आधेसे कम आबाद देशकी उपज व खपतकी शक्ति बढ़ाते हैं, निकालकर और खाली करा लें। ... उपनिवेश भारतीयोंके आगमनको जरूर रोक सकता है, और 'लोक- प्रियताके दीवाने' जितना चाहेंगे उससे कहीं अधिक सरलता के साथ और स्थायी रूपमें रोक सकता है । परन्तु सेवाके अन्तमें उन्हें जबरन निकाल देना उसके बशकी बात नहीं है । और में उससे अनुरोध करता हूँ कि इसकी कोशिश करके वह एक अच्छे नामको कलंकित न करे । भारतीयोंके प्रवेशके प्रश्नकी जाँच करनेके लिए नियुक्त आयुक्त (कमिश्नर ) स्वर्गीय श्री जेम्स आर० सॉडर्सके ये शब्द हैं। अपने पदकी जिम्मेदारीको पूरी तरह समझते हुए उन्होंने ये शब्द कहे थे । जो बात सन् १८८७ में सही थी, आज भी वह उसी तरह सही है; क्योंकि यह कहते हुए श्री साँडर्सने सबसे ऊँची भूमिकापर खड़े रहकर, अर्थात् सत्य और असत्य, न्याय और अन्यायकी दृष्टिसे विचार किया था। हमें निश्चय है कि न्याय और अन्यायकी परिभाषामें पिछले सोलह वर्षोंमें कोई भारी परिवर्तन नहीं हो गया है। हाँ, जिनके सामने केवल स्वार्थं या ऐसे ही विचार प्रधान रहे हों, उनकी बात हम नहीं करते। परन्तु श्री साँडर्सने सन् १८८७ में इनका भी बहुत सावधानीसे विचार कर लिया था और फिर भी वे इसी नतीजेपर पहुँचे थे कि एक ब्रिटिश उपनिवेशमें मजदूरोंको जबरदस्ती लौटानेका काम नहीं हो सकेगा । नेटालकी सरकारने कुछ समय पहले इस तरह गिरमिटिया मजदूरोंको उनकी गिरमिटकी अवधि पूरी होनेपर जबरदस्ती लौटानेके जो यत्न किये थे और अब फिर किये हैं, उनके बारेमें हमें क्या सोचना चाहिए ? आशा करनेके लिए कोई गुंजाइश तो नहीं है, फिर भी हम आशा करना चाहते हैं कि श्री चेम्बरलेनने जो यह कहा कि भारत सरकारने नेटाल सरकारके प्रस्तावको अपनी मंजूरी दे दी है इसमें उन्होंने कहीं भूल की है। सन् १८९४ में मजदूरोंको जबरदस्ती वापस लौटानेका प्रस्ताव लेकर नेटालसे पहला आयोग (कमिशन) भारत गया। लॉर्ड एलगिन उस समय वाइसराय थे। इन्हें वह अपना प्रस्ताव मंजूर करनेके लिए राजी करना चाहता था; किन्तु लॉर्ड एलगिनने प्रस्तावको उसी रूपमें माननेसे इनकार करते हुए कहा : मैं तो यही पसन्द करता हूँ कि अभी जो व्यवस्था है वही जारी रहे, अर्थात् अपनी गिरमिटकी अवधि पूरी होनेपर अगर मजदूर चाहे कि वह वहीं बस जायें तो भले ही वह वहीं रहे। अतः जो लोग साम्राज्यके किसी प्रजाजनको ब्रिटिशों द्वारा शासित किसी उपनिवेशमें बसनेसे रोकना चाहते हैं, उनसे मुझे कोई सहानुभूति नहीं है । परन्तु भारतीय प्रवासियोंके प्रति नेटाल उपनिवेशमें जो भावना प्रकट हो रही है Gandhi Heritage Portal