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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/११

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सात (पृष्ठ १९१-९२) ले सकते हैं। उनके हृदयकी गहराइयोंमें आस्थाके जलते दीपका प्रकाश अपने शंकालु सहयोगियोंको दिये इस उत्तरमें दिखाई देता है: “ कोई भी सुधार आरम्भ में चाहे जितना असम्भव प्रतीत हो, उसे सम्पन्न करनेके लिए एक ही व्यक्ति पर्याप्त होता है । . I... . चाहे पुरस्कार-स्वरूप उस व्यक्तिको उपहास, तिरस्कार और मृत्यु ही मिले और अकसर यही सब मिलता भी है । किन्तु उसकी मृत्यु भले ही हो जाये, उसका आरम्भ किया हुआ वह सुधार कार्य कायम रहता है और वह आगे बढ़ता रहता है । वह अपने खूनसे उसकी जड़को पक्की बना देता है" (पृष्ठ ४०७) । " अहिंसा में भी उनका विश्वास उतना ही प्रबल, उतना ही अखण्ड था । वे मानते थे कि अहिंसा मानव जीवनका श्रेय है और इसके लिए उसे प्रयत्न करना ही चाहिए। जब इस सिद्धान्तके आलोचकोंने इसकी व्यावहारिकतापर शंका की -- जैसे कि "दूर देश अमेरिकासे" शीर्षक लेखमें - तब गांधीजीने उसका बड़ा स्पष्ट उत्तर दिया : अगर हमें आगे बढ़ना है तो हमें इतिहासकी पुनरावृत्ति नहीं करनी चाहिए, बल्कि नये इतिहासका निर्माण करना चाहिए। हमें अपने पूर्वजों द्वारा छोड़ी गई विरासतको और भी समृद्ध करना चाहिए। अगर हम भौतिक जगत् में नये-नये आविष्कार और नई-नई खोजें कर सकते हैं, तो क्या आध्यात्मिक जगत् में अपनी असमर्थताकी घोषणा करना ठीक है ? क्या उक्त अपवादोंकी संख्या बढ़ाकर उन्हें आम बना देना असम्भव है ? क्या यह जरूरी है कि इन्सान बनने से पहले आदमी पशु बने ही और तब, यदि बन सके तो इन्सान बने" (पृष्ठ ४४७ ) ? 46 स्वीडनके एक जिज्ञासुने असहयोग आन्दोलनकी आलोचना करते हुए एक लेख लिखा था । उसका उत्तर उन्होंने इन शब्दों में दिया : अहिंसक असहयोग और पाश्चात्य संसारके ऐतिहासिक स्वातंत्र्य-संघर्ष के बीच भी कोई साम्य नहीं है । असहयोग शरीर-बल अथवा घृणापर आधारित नहीं है।... यह तो आत्म शुद्धिका आन्दोलन है । इसलिए इसमें अत्याचारीको अपनी भूलका एहसास कराकर सही रास्तेपर लानेका प्रयत्न किया जाता है" (पृष्ठ ६) । वे इस विचारसे सहमत नहीं थे कि भारतका यह अहिंसात्मक आन्दोलन विफल हो गया है, क्योंकि "भारतके स्वातंत्र्य-संघर्ष में अहिंसाको एक स्थायी स्थान प्राप्त हो गया है" (पृष्ठ ६) । और गांधीजीने तब जो-कुछ कहा था, वह सत्य कहा था, इसकी साक्षी परवर्ती घटनाक्रम देता है। इस खण्डमें यत्र-तत्र पत्र रूपी मोती भी जड़े हुए हैं। इनमें से कुछ आश्रमके बच्चों और कुछ आश्रमवासी भाई-बहनोंको, कुछ दूर देशों में रहनेवाले अनचीन्हे अनजाने लोगोंको तथा कुछ सहकर्मियों और सहयोगियोंको लिखे गये हैं। इनके विषय विविध और व्यापक हैं। इन पत्रोंसे प्रशंसक आलोचक, बाल-वृद्ध, स्वदेशी-विदेशी समस्त मानवोंकी कल्याण-साधनाके लिए उनकी चिन्ता परिलक्षित होती है । Gandhi Heritage Portal