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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/१२

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आठ निराशा, अशान्ति या आपदाओंके बीच शान्ति प्राप्त करनेका उनके पास एक अमोघ उपाय था । वे मानते थे कि : " शान्ति तो अपने भीतरसे ही प्राप्त होगी और उसका रास्ता है, अपने मनको प्रभुमें लगाना और उसमें अटूट विश्वास रखना । जो व्यक्ति यह अनुभव करता है कि ईश्वर उसके भीतर विद्यमान है और वह बराबर उसके साथ है, उसे एकाकीपनका अनुभव हो ही नहीं सकता । मुझे जो कुछ शान्ति मिली है, इसी विश्वासके बलपर मिली है कि हर चीजके पीछे ईश्वरका हाथ है । फिर विपत्तियाँ विपत्तियाँ नहीं रह जातीं । वे हमारी आस्था और दृढ़ताकी परीक्षा करती हैं" (पृष्ठ ६०५-६) । चाहे व्यक्तिगत जीवन हो या सार्वजनिक जीवन, वे आत्मबलपर सबसे अधिक जोर देते थे। गुजरात महाविद्यालयके विद्यार्थियोंके सम्मुख बोलते हुए उन्होंने कहा : "संख्याके बलपर तो कायर लोग कूदते हैं। आत्मबलवाला मनुष्य अकेला जूझता है । इस विद्यापीठमें हम आत्मबलकी शिक्षा लेने आये हैं- • सो इसमें साथ देनेवाला एक हो या अनेक, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । आत्मबल ही सच्चा बल है । और यह निश्चित मानिए कि यह बल तपश्चर्या, त्याग, दृढ़ता, श्रद्धा और नम्रता तथा विनयके बिना प्राप्त नहीं हो सकता " (पृष्ठ ६२२-२३) । Gandhi Heritage Portal