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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/१९७

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एक चरखा-प्रेमीका दुःख

और यह घड़ी खोनेपर दूसरी न मिलेगी, यह जानते हुए भी जो मनुष्य उसके सम्बन्धमें चिन्ता नहीं करता, उसका किसी दिन अपरिग्रही होना सम्भव है। और फिर यदि एक चीजका व्रत लेनेवालेमें ईर्ष्याका भाव आ जाये तो यह कोई उसका नया अवगुण नहीं है; बल्कि समझना चाहिए कि जो अवगुण मनमें भरा था वही संग-प्रसंगसे पनप गया है। व्रतोंकी महिमा ऐसी ही है। एक मलिनताकी सफाई करते हुए दूसरी बाहर आ जाती है और एक व्रतके सम्बन्धमें सफलता मिलनेपर समस्त मलिनताका निकल जाना सम्भव है। जो मनुष्य मनसे व्रत नहीं लेता, उसने तो व्रत लिया ही नहीं। वह खोटा सिक्का है और हम खोटे सिक्केपर से सच्चेका मूल्यांकन नहीं कर सकते।

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अयोध्याकाण्ड तो ऐसा है कि अगर मनुष्य उसे हजार बार पढ़े तो भी न ऊबे। इसलिए इसपर तुम जितनी मेहनत करोगे उतना ही उसका फल होगा।

गुजराती प्रति (एस° एन° १९८७८ ए) की माइक्रोफिल्मसे।

 

१६०. एक चरखा-प्रेमीका दुःख

धर्मका पालन करना कितना कठिन है, यह बात "अविश्वास या उचित सावधानी?"[] शीर्षक लेखके उत्तरमें मिले निम्न पत्रसे[] स्पष्ट हो जाती है :

इस बातको तो मैं पहले ही स्वीकार कर चुका हूँ कि चरखा-संघको दिया हुआ सूत वापस न दिया जाये, यह उत्तम होगा और यही इष्ट है कि कोई इस सुतकी वापसीकी माँग न करे। लेकिन मनुष्य-स्वभाव एक ही साँचेमें नहीं ढला हुआ है। इसलिए सिद्धान्तको आंच न आये, इस बातका ध्यान रखकर कुछ छूट तो देनी ही पड़ती है। ठीक यही बात यहाँ भी हुई है।

चरखा-प्रेमीके चरखा संघ-सम्बन्धी विचार मेरे ध्यानसे बाहर नहीं थे। मेरा काम तो उनके लेखसे जो सीधा अर्थ निकलता है, उससे उत्पन्न होनेवाली दिक्कतोंको बताना था। चरखा-संघ तो एक सांसारिक लाभका साधन है और नहीं भी है। उसे सभी लोग मोक्षका द्वार नहीं मानते। वस्तुतः देखा जाये तो उसे थोड़े-से ही लोग ऐसा मानते हैं। ज्यादातर लोग तो खादीके आर्थिक पक्षको ही स्वीकार करते हूँ और चरखा-संघ खादी-प्रचार में काफी मदद करता है, यह सोचकर उसमें सम्मिलित

 
  1. १४ मार्च, १९२६।
  2. पत्रका अनुवाद यहाँ नहीं दिया गया है। पत्र लेखकका समाधान लेखमें दिये गये गांधीजीके तकाँसे नहीं हो सका था। उसका कहना था कि चरखा-संघको जिन अवांछनीय कार्रवाइयोंके विरुद्ध सावधानीका कदम उठाना पड़ा है, वे कताईको कांग्रेसकी सदस्यता सम्बन्धी धाराके द्वारा राजनीतिका अंग बना देनेसे उत्पन्न हुई हैं।

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