२३१. जडाऊ जूतियाँ बनाम चिथड़े
अपने इस सिद्धान्त के समर्थन में कि जब पादरी अपने श्रोताओंको प्रसन्न करनेके लिए धर्मग्रन्थोंको व्याख्या तोड़-मरोड़ कर करता हो और व्यापारी अधिक ग्राहक पानेके लिए सत्यके साथ खिलवाड़ करता हो तब भी ये दोनों ईमानदार माने जा सकते हैं, श्री मतलबीने[१]}} अपना वक्तव्य इन शब्दोंसे समाप्त किया कि :
श्री मतलबीके समर्थक भी थे—जैसे सर्वश्री संसारासक्त[१]}}, अर्थ-प्रेमी[१]}} आदि-आदि। वैसे तो श्री धर्मात्मा[१]}} और श्री आशावादी[१]}} सर्वश्री मतलबी तथा उनके साथियोंकी वक्तृतासे काफी अभिभूत हो गये थे, फिर भी वे अपनी टेकपर बने रहे और अपने तनमनसे धर्ममें अपनी आस्थाकी रक्षा करते रहे—विशेषकर तब, जबकि धर्म चिथड़ों में लिपटा, तिरस्कृत अवस्थामें सामने आया। उनके सामने श्री आस्थावानका[१]}} शानदार उदाहरण था। उसे मिथ्याहंकार-नगरके निवासियोंने यातना दे-देकर मार डाला था, लेकिन वह कभी भी अपने पथसे विचलित नहीं हुआ था। बिहार विद्यापीठके दीक्षान्त समारोह में श्रीयुत राजगोपालाचारीने भी चिथड़ोंमें लिपटी और तिरस्कृत देशभक्तिका कुछ इसी प्रकार बचाव किया। उन्होंने कहा :
हाँ, विद्यापीठके स्नातकों को रेशमी चोगे नहीं मिलेंगे, जड़ाऊ जूतियाँ नहीं मिलेंगी, न उपकुलपतिको सोनेकी चमकती हुई जंजीर ही मिलेगी। उपकुलपति महोदयको कातनेवालों और बुननेवालोंकी मेहनत करते-करते सख्त पड़ गई अँगुलियों से काती और बुनी खुरदरी खादीका भार सहना पड़ेगा और स्नातकोंको, अगर वे अपने विश्वविद्यालयके सिद्धान्त के प्रति ईमानदार रहना चाहते हैं तो, अपने कन्धोंपर जन-सेवाका भार उठानेमें ही सन्तोष मानना होगा। वे उस सिविल सर्विसके सदस्य हैं,