२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय कम होती जा रही है । डर्बन-जैसे नगरमें, जहाँ भारतीयोंकी आबादी. सबसे अधिक है, १९२१ से १९२५ तक भारतीयोंकी सम्पत्तिमें कुल मिलाकर मोटे तौरपर सिर्फ ढाई लाख रुपये की मालियतकी वृद्धि हुई, जबकि यूरोपीयोंकी सम्पत्ति में चालीस लाख रुपयेकी मालियतकी वृद्धि हुई । किन्तु डर्बन और उसके आस- पासके क्षेत्रों में भारतीयों और यूरोपीयोंका अनुपात ४ : ५ का है। मैं पहले ही बता चुका हूँ और यहाँ फिर बताना चाहूँगा कि १९२१ की जनगणना के अनुसार प्रतिवर्ष जहाँ यूरोपीयोंकी आबादीमें ३९.८ प्रतिशत की वृद्धि हुई, वहाँ भारतीयोंकी आबादीमें सिर्फ ६.१ प्रतिशत की ही वृद्धि हुई । भारतीय बहुत बड़ी तादाद में उस देशको, फिर कभी वापस न जानेके इरादेसे, छोड़ रहे हैं। जो भारतीय वहाँ पहलेसे ही हैं, उनके अलावा औरोंको तो आने ही नहीं दिया जाता । दक्षिण आफ्रिका संघमें भारतीय पुरुषोंकी संख्या स्त्रियोंसे ज्यादा है । इसलिए जन्म-दरके ऊँचे होने की सम्भावना भी नहीं है । १९२१ में संघ में कुल मिलाकर केवल १,६१,००० भारतीय थे। अगर कहीं-कहीं भारतीय दुकानोंकी संख्या बढ़ रही है तो मैंने अपनी आँखों देखा है कि कुछ दूसरी जगहों में वह उतनी ही घट भी रही है। इसलिए आर्थिक भयका कारण ही क्या हो सकता है ? अगर जल्दबाजी न की जाये तो यह समस्या अपने-आप हल हो जायेगी; और जैसे-जैसे समृद्धि-सम्पन्नता बढ़ती जायेगी (व्यापारको वृद्धिके साथ-साथ इसका बढ़ना भी निश्चित ही है ) श्रमिकोंका अभाव सर्वत्र महसूस किया जाने लगेगा और फिर तो इस देशको खुद ही उन अधिकांश भारतीयोंकी आवश्यकता अनुभव होने लगेगी जो अब भी उद्योग और कृषिके क्षेत्रमें वहाँ उपयोगी और ठोस काम कर रहे हैं । ऐसे समय में इतने लाभदायक श्रमिकों को 'देशसे बाहर निकालना, वास्तवमें लगभग एक अनर्गल बात जान पड़ती है। श्री एन्ड्रयूज इतना और कहते तो ठीक ही होता कि दक्षिण आफ्रिका के अन्य हिस्सों में एक भारतीयकी स्थिति डर्बनमें बसे भारतीयसे लाख दर्जे बुरी है । संघके अधिकांश हिस्सों में वह भूमिहीन है और उसे सिर्फ यूरोपीय भू-स्वामियोंकी कृपापर जीना पड़ता है। उसका एकमात्र अपराध यही है कि श्रमिक होने के साथ-साथ वह व्यापार भी करता है और इस तरह ईमानदारीसे रोटी कमाता है। अगर निष्पक्ष दृष्टिसे देखा जाये तो एशियाइयोंके विरुद्ध जो चीख-पुकार मचाई जा रही है, उसका कारण सिर्फ विवेकशून्य सगभेद और क्षुद्र व्यापारिक स्पर्धा ही है । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, ११-२-१९२६ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/३८
दिखावट