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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/३९

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२. बाकी पैसेसे खादी खरीदिए' जो भी हो, आप देखेंगे कि तीसरे बजेंमें सफर करनेसे कितना पैसा बच जाता है। उस बचे हुए पैसेसे आप खावी खरीद सकते हैं। अब इसपर मुझे यह याद आ जाता है कि मैंने [ यात्राकी ] यह कहानी क्यों शुरू की। में तीसरे दर्जे में सफर कर रहा था। मैं सोच रहा था अभी-अभी दो भिखारी बच्चोंने कितना सुन्दर गाना गाया है और यदि टिकट कलक्टर इन आवारा बच्चोंको गाड़ीमें चढ़ने ही न दे तो ऐसे साहित्यका क्या होगा । तभी एक सज्जन, जो शिक्षित थे और साफ-सुथरे लिवासमें थे और मेरी ही तरह अपने हिस्से-भर की जगहसे ज्यादा घेरे हुए थे, उठ बैठे और मुझसे पूछा 'श्रीमन् ! यदि मैं आपसे एक सवाल पूछूं तो आप बुरा तो नहीं मानेंगे ? " और उन्होंने सवाल एक नहीं अनेक किये। मुझे उन्हें तरह-तरहसे अनेक बार खादीका औचित्य समझाना पड़ा। यह सब बहुत दिलचस्प था और एक अद्भुत बात यह हुई कि उनकी शंकाओंका समाधान करते-करते इस विषय में खुद मेरे ही विचार बहुत साफ हो गये । ८८ पिछले कुछ वर्षोंसे सम्पादक तीसरे दर्जे की यात्राके सुख-दुःखसे अपरिचित रहा है, इसलिए उसे तीसरे दर्जेसे सम्बन्धित अच्छे ढंगसे कही गई कहानियोंको अंकमें स्थान देते हुए बड़ा हर्ष होता है- विशेषकर तब जब कि उन कहानियोंका सम्बन्ध जन- साधारणके भाग्यचक्रसे होता है। [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, ११-२-१९२६ ३. स्वीडनसे एक स्वीडन निवासी सज्जन लिखते हैं : हर हफ्ते आपका अखबार पाकर मुझे अतीव प्रसन्नता होती है और ऐसा लगता है, मानो में बराबर आपके सम्पर्क में हूँ । 'यंग इंडिया' में में देखता हूँ कि आप सुदूरवर्ती देशोंके लोगोंके प्रश्नोंके भी उत्तर देते हैं और इससे मेरे मनमें यह खयाल आता है कि क्या आप मेरे प्रश्नोंके भी उत्तर देंगे । क्या आप अपने अखबार के जरिये मुझे यह बतायेंगे कि अपने पहले कार्यक्रमकी १. तीसरे दर्जेमें सफर के बारेमें लिखे च० राजगोपालाचारीके इस लेखके सिर्फ उसी प्रासंगिक अंशका अनुवाद यहाँ दिपा गया है, जिसपर गांधीजीने टिप्पणी की थी। Gandhi Heritage Portal