सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/९

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

भूमिका इस खण्डमें ११ फरवरीसे लेकर १४ जून, १९२६ तककी सामग्री दी गई है। इस साल गांधीजीने विश्राम करनेके उद्देश्यसे सत्याग्रह आश्रमकी शरण ली थी, जहाँ वे चुपचाप अपनी कर्म-साधनामें लगे रहे। स्वास्थ्य-सुधारके लिए वे मसूरी जानेवाले थे, लेकिन फिर उन्होंने यह विचार भी त्याग दिया। इसी प्रकार अमेरिका, चीन और फिनलैंडसे आये आमन्त्रणोंको भी उन्होंने अन्ततः अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वे मानते थे कि अगर मेरे सन्देशमें कोई शक्ति है तब तो मेरी शारीरिक उपस्थितिके बिना भी लोग उसे महसूस करेंगे ही" (पृष्ठ ५८२) । अलबत्ता भारतीय किसानोंके कल्याणकी चिन्ता उन्हें महाबलेश्वर खींच ले गई, जहाँ उन्होंने बम्बईके गवर्नरके साथ भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित कृषि आयोगके सम्बन्धमें बातचीत की। " आश्रममें वे 'आत्मकथा' के अध्याय लिखते रहे, जन-हितसे सम्बन्धित समस्याओंपर 'नवजीवन' और 'यंग इंडिया' में अपने विचार व्यक्त करते रहे और बीसियों प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध लोगोंके साथ वैयक्तिक, सामाजिक एवं अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्वके विषयोंपर पत्राचार करते रहे। " दक्षिण आफ्रिकाकी जाति-विद्वेषकी समस्यासे उनका मन बड़ा आन्दोलित रहा - इतना कि आवश्यकता होनेपर उन्होंने वहाँ जानेकी भी तत्परता बताई। प्रतिक्रिया- वादी एशियाई विधेयक उनकी दृष्टिमें "विश्वासघात' था; डॉ० मलानका यह प्रस्तावकी समिति के सामने केवल पैडिसन शिष्टमण्डलकी ही मार्फत बयान पेश किये जायें, भारत सरकारकी इससे मूक सहमति उन्हें बहुत नागवार गुजरी। लेकिन जब सरकारके प्रयत्नोंसे क्षेत्र आरक्षण विधेयक स्थगित हो गया तो उन्होंने उसकी इस 'कूटनीतिक विजय" के लिए उसे बधाई दी और उससे भारतीयोंकी न्याय और समान- ताकी माँगोंपर आग्रह रखनेका अनुरोध किया। उनका यह दृढ़ मत था कि प्रवासी भारतीयोंकी मुक्तिका उपाय अन्ततः उनके अपने ही हाथों में है। उन्होंने लिखा “ वे एक हों और सदा एक होकर रहें; और सबसे बड़ी बात तो यह है कि वे सबके हित-साधनके लिए कष्टसहन करनेके संकल्प और दृढ़ताका परिचय दें" (पृष्ठ ४०६ ) । ५ मईको अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी साबरमतीको बैठकमें दक्षिण आफ्रिकासे सम्बन्धित गांधीजीका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया । उन्होंने दक्षिण आफ्रिकी भारतीय कांग्रेसको आश्वस्त किया कि सी० एफ० एन्ड्रयूज और स्वयं उनसे रंग-भेद विधेयकके खिलाफ भारतमें जो कुछ भी करते बनेगा, वे अवश्य करेंगे। लेकिन साथ ही प्रवासी भारतीयोंसे वे ऐक्यबद्ध रहने और "अपने भीतर सत्याग्रहको शक्तिका विकास" करनेकी अपेक्षा भी रखते थे (पृष्ठ ५४०-४१) । रंग-भेद विधेयकके पास होनेपर उन्होंने उसे वर्ग- Gandhi Heritage Portal