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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/१०

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छ: वर्षोंतक समझाते- बुझाते रहनेपर भी अभीतक ऐसे शिक्षित लोग बचे हुए हैं जो इस अनीतिपूर्ण कुप्रथाका समर्थन किये ही चले जा रहे हैं। गांधीजीने थोड़े दुःखके साथ लिखा: “यदि किसी धार्मिक ग्रन्थमें किसी प्रसिद्ध पुरुषके पाप करनेका उल्लेख हो तो क्या उससे हमें भी पाप करनेकी आज्ञा मिल जाती है ? यदि हमसे उन्होंने केवल एक बार ही यह कह दिया कि इस संसारमें केवल सत्यकी ही सत्ता है और सत्य परमेश्वरके तुल्य है तो हमारे लिए इतना ही बहुत है।" (पृष्ठ २२०-२१) " शब्दोंका अत्याचार" नामक एक लेखमें गांधीजीने लिखा कि तर्क और तर्क- बुद्धिसे भी पहले आते हैं श्रद्धा और प्रार्थना । इनका स्थान पहला है । उनके विचारसे जब तर्क-बुद्धि अपने-आपको सर्वशक्तिमान मानने लगती है तो वह एक आसुरी वृत्ति बन जाती है, क्योंकि "श्रद्धा और विश्वासके बिना जो काम किया जाता है वह उस कागजी फूलके समान होता है, जिसमें सुवास नहीं होती।” (पृष्ठ ५१९) तर्क अथवा तर्क-बुद्धिकी परवाह न की जाये, ऐसा वे नहीं चाहते थे, किन्तु वे यह अवश्य चाहते थे कि बुद्धिको पवित्र बनानेवाले विश्वासको आवश्यक स्थान दिया ही जाना चाहिए। प्रार्थना तो उनके जीवनका एक अविच्छिन्न अंश ही था । वे भोजनके बिना रह सकते थे प्रार्थनाके बिना नहीं । "बिना खाये तो मनुष्य काफी दिनों जीवित रह जाता है परन्तु ईश्वराराधनाके बिना वह एक पल भी जीवित नहीं रह सकता । इस तथ्यको चाहे वह न माने, किन्तु इसे न मानना वैसा ही होगा, जैसा किसी बेसमझ व्यक्तिका अपने शरीरमें फेफड़ोंके अस्तित्व अथवा रक्तके प्रवाहको न मानना । (पृष्ठ १०८) एक सज्जनको पत्र लिखते हुए उन्होंने कहा, " प्रार्थना तो नित्य शुद्धिके लिए की जाती हैं। शरीर शुद्धिके लिए नित्य स्नानका जो महत्त्व है, हृदय और मस्तिष्कके लिए वही महत्त्व प्रार्थनाका है । " (पृष्ठ २३५) वे प्रार्थनाको याचना नहीं, आत्माकी पुकार मानते थे । 'यंग इंडिया' के स्तंभों में किसी राष्ट्रीय संस्थाके प्रधानाचार्यको, जिनका प्रार्थनामें विश्वास नहीं था, गांधीजीने उत्तर देते हुए लिखा : ईश्वरका अस्तित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता और न उसे सिद्ध करनेकी जरूरत ही है । ईश्वर तो है ही ।" (पृष्ठ ४५८) यही वह निष्ठा है जिसके बलपर गांधीजी कठिनसे कठिन परिस्थितियों में भी आन्तरिक शान्ति बनाये रखकर सरल मार्गको अपना पाते थे । 26 अहिंसाके तत्त्वसे ओतप्रोत तथा सत्य और अहिंसाको अपनी एक-एक साँस खींचनेके लिए फेफड़ोंकी तरह आवश्यक माननेके कारण उन्होंने नित्य अधिकाधिक रूपमें अहिंसाकी अपारशक्ति सम्बन्धी अपने विश्वासको स्पष्ट रूपमें देखा और यह भी देखा कि आदमी स्वयं कितना नगण्य है। उन्होंने 'यंग इंडिया ' में लिखा : " सबसे बड़ी ताकत जो मानवको प्रदान की गई है, अहिंसा है। सत्य उसका एकमात्र लक्ष्य है । क्योंकि ईश्वर सत्यसे इतर कुछ और नहीं है। लेकिन सत्यकी प्राप्ति अहिंसाके अतिरिक्त Gandhi Heritage Portal