टिप्पणियाँ ५३९ हम चाहते हैं कि न्यायकी जीत हो तो इस तरहकी एकताकी पूरी-पूरी जरूरत है । इस सहमतिका असर दक्षिण आफ्रिकाके लोकमतपर अवश्य होगा । किन्तु हमारा यह ऐक्य विदेशों में रहनेवाले भारतीयोंके दर्जे के प्रश्नतक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। क्या यह इच्छा करना बेजा है कि यह एकता उन प्रश्नोंके बारेमें भी होनी चाहिए जो इतने ही स्वाभाविक और शुद्ध हैं ? अथवा यह बात है कि एकता केवल उन्हीं प्रश्नोंके सम्बन्धमें सम्भव है जो स्थानकी दृष्टिसे एक होनेवाले लोगोंसे दूर पड़ते हैं ? सच्ची एकता अपने आप होती है। दक्षिण आफ्रिकाके प्रश्नपर एकमत होनेके लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ा। इस बारेमें सभी लोगोंने सहज- भावसे एक ही ढंगसे सोचा । दूसरे मामलोंके सम्बन्धमें भी एकता इसी तरह सहजभावसे होगी; किन्तु वह समय आनेपर ही होगी। मुझे आशा है, और मैं खयाल करता हूँ कि हममें से कई लोग इस एकताके जबतक आनेकी आशा या कल्पना करते हैं, वह उसकी अपेक्षा जल्दी ही आ रही है । किन्तु हम फिर शिष्टमण्डलकी बातपर आयें। दक्षिण आफ्रिकाके प्रवासी शिष्ट- मण्डलसे और दक्षिण आफ्रिकी संघकी सरकारसे श्री सी०एफ० एन्ड्रयूजकी मार्फत सम्बन्ध कायम रखेंगे । प्रवासियोंके सम्मुख जो यह अवसर आया है, उन्हें इसका अधिकतम लाभ उठाना चाहिए। उन्हें अपनी समस्त शक्तियोंको इकट्ठा कर लेना चाहिए। उनमें जो अच्छेसे अच्छे कार्यकर्त्ता हों, उन्हें चाहिए कि वे सारी उपलब्ध सामग्रीको इकट्ठा करके श्री एन्ड्रयूजको सौंप दें। उन्हें शिष्टमण्डलकी मर्यादाओंको समझ लेना चाहिए और अपनी माँग मजबूतीसे मर्यादित रूपमें पेश करनी चाहिए। यदि वे सत्यपर आरूढ़ रहेंगे और उसके साथ-साथ मर्यादा, दृढ़ता और एकताको बनाये रखेंगे तो जीत आसान हो सकती है । कांग्रेस प्रदर्शनी पहले प्रदर्शनियाँ अ० भा० कांग्रेसका एक अंग बन गई थीं । किन्तु वे बादमें बन्द हो गईं। अहमदाबाद कांग्रेसके अवसरपर प्रदर्शनीकी प्रथा फिर शुरू की गई और तबसे उनमें बराबर सुधार होता आया है । इन प्रदर्शनियोंमें खद्दर ही खास चीज रहा करती है । खद्दरके साथ-साथ उनमें उन सब हस्तक्रियाओंका भी प्रदर्शन किया जाता है, जिनके द्वारा कपास परिवर्तित होकर खद्दरके रूपमें हमारे सामने आती है । इन प्रदर्शनियोंमें केवल उन्हीं वस्तुओंको स्थान मिलता है जो शुरूसे आखिर तक हिन्दुस्तानमें ही बनाई जाती हैं । इसलिए इन प्रदर्शनियोंके प्रबन्धकर्त्ताओंने नाम- मात्रकी स्वदेशी घड़ियों या हारमोनियमोंको, जिनका प्रत्येक पुर्जा बाहरसे मँगवाया जाता है, प्रदर्शित नहीं करने दिया है। उन्होंने मिलोंका तैयार किया हुआ सूत और कपड़ा रखना भी स्वीकार नहीं किया है। इन प्रदर्शनियोंका उद्देश्य तो यही है कि उन चीजोंके उत्पादनको प्रोत्साहन मिले जिनकी बेकदरी की गई है और जो प्रोत्सा- हनकी पात्र हैं। शायद ही कोई मनुष्य ऐसी लकड़ियोंके गट्ठरोंको प्रदर्शनीमें रखें, जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति जानता है और जो हर किसीके इस्तेमाल में आती हैं । लेकिन ऐसे काठका प्रदर्शन किया जा सकता है जिसमें कोई ऐसी बड़ी खासियत है जिसे Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५७५
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