क्या यह जीवदया है ? - ३ ५४५ प्रतिक्रियासे बच सका हूँ या नहीं। और अगर में उनके क्रोधका मूल खोजता हूँ तो उसकी तहमें प्रेम ही पाता हूँ। उन्होंने मुझमें अपनी समझके अनुसार अहिंसाकी कल्पना कर ली थी। अब उनको अपनी कल्पनासे उलटा दिखाई देता है । वे मुझे महात्मा मानते थे इसीलिए वे मुझपर क्रोध करते हैं, वे लोगोंपर मेरा अपने अनुकूल प्रभाव पड़ता देखकर प्रसन्न होते थे । अब मैं उनको अल्पात्मा लगता हूँ । वे मेरे प्रभावको कुप्रभाव मानकर दुःखी होते हैं और चूंकि उन्होंने क्रोधको जीतना नहीं सीखा इसीलिए उनका यह दुःख क्रोधमें परिणत हो जाता है । मैं उनके इस क्रोधका स्वागत करता हूँ; उसके पीछे जो भाव है, उसे मैं समझता हूँ। मैं उन्हें धीरजसे समझानेका प्रयत्न करूँगा । उस प्रयत्नमें सहायता करनेके लिए मैं उनसे विनती करता हूँ कि वे अपने क्रोधको शान्त करें। मैं उनके क्रोधको समझ गया हूँ। मैं सत्यका पुजारी तथा शोधक हूँ । यदि मुझसे भूल हुई होगी तो मैं उसे देख लूँगा और चूंकि भूलको कबूल करना मुझे प्रिय है, इसलिए उसे तुरन्त कबूल करके सुधार लूंगा । शास्त्रका वचन है कि सत्यवादी एवं सत्याचरककी भूलोंसे भी जगतको क्षति नहीं पहुँचती । सत्यकी महिमा ऐसी ही है । मित्रों और सुहृदोंके लिए बस इतना ही कहूँगा : मैंने आपके पत्र एक जगह रख लिये हैं । बहुतोंको तो मैं सामान्यतया व्यक्तिगत रूपसे उत्तर दे रहा हूँ । लेकिन इस विषयमें इतने लोगोंके और इतने लम्बे-लम्बे पत्र आये हैं कि उनका सविस्तार उत्तर देना अशक्य है । पत्रोंकी पहुँच दे सकनेका अवकाश भी मेरे पास नहीं है । कुछ लेखक तो अपने पत्रोंको 'नवजीवन' में प्रकाशित कराना चाहते हैं । वे मुझे इस बोझसे मुक्त कर दें। मैं उनकी दी हुई दलीलोंका उत्तर यथाशक्ति और यथामति देनेका प्रयत्न अवश्य करूँगा । वे लोग इतने ही से सन्तोष मान लें । मैं उनसे इतनी ही प्रार्थना करता हूँ । प्रस्तावना लम्बी हो गई है; किन्तु पाठक इसे आवश्यक समझकर क्षमा करेंगे । अब हम मूल विषयपर आयें फिलहाल तो मैं प्राप्त पत्रोंके प्रश्नोंपर विचार करके ही सन्तोष मानूंगा । एक भाई लिखते हैं : --- आप कुत्तोंको खाना देनेके लिए मना करते हैं, लेकिन मैं उनको बुलाने तो नहीं जाता - वे तो खुद बखुद आ जाते हैं और खड़े रहते हैं । उनको कैसे मार भगायें ? जब बहुत-से कुत्ते आ जायेंगे, तब देखा जायेगा। कुत्तोंको खाना देनेसे मनुष्यमें दयाभाव पनपता है और न देनेसे निष्ठुरता आती है । हम पापमें डूबे हैं, फिर हम जितना हो सके उतना धर्म क्यों न करें ? इस प्रकार दयापूर्ण दिखाई देनेवाले विचारोंके कारण ही हम लोग दया-धर्मके नामपर हिंसाको अनजाने ही बढ़ावा दे रहे हैं । लेकिन जिस प्रकार लौकिक राजाके कानूनके अज्ञानके कारण अपराधी दण्डसे बचता नहीं है, वही बात अलौकिक राजाके नियमोंके सम्बन्धमें भी लागू होती है । ३१-३५ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५८१
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