५४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय हम जरा उक्त शंका करनेवालेके तर्कपर भी विचार करें। हम अपने घरपर भिखारीके आनेपर उसे रोटी देते हैं और समझते हैं कि हमने पुण्य किया। हम इस प्रकार बहुत हदतक भिखारियोंके सम्प्रदायको बढ़ाने, आलस्यको बढ़ावा देने और इस कारण अधर्मकी वृद्धि करनेमें निमित्त बनते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि सच्चे भिखारियोंको मरने दिया जाये। जो अपंग या अपाहिज हैं, उनका पोषण करना समाजका धर्म है। लेकिन हम व्यक्तिगत रूपमें इस कामका उत्तरदायित्व न लें यह काम समाजके अधिकारी यानी प्रतिनिधि स्वराज्य हो तो राजा - को करना चाहिए। इसके लिए संस्था हो और दयालु सज्जन ऐसी संस्थाको दान दें। यदि प्रतिनिधि पवित्र तथा ज्ञानवान् होगा तो प्रत्येक भिखारीको उसके बारेमें प्रयत्नपूर्वक पूछताछ करके, वह पात्र होगा तो, आश्रय देगा। ऐसा न होनेसे भिखारीके वेशमें चोर और लम्पट पुरुष पैसा कमाते हैं और देशमें भुक्खड़पन घटनेके बदले बढ़ता है । - - जिस प्रकार भिखारीको खाना देनेमें पाप है, उसी प्रकार आवारा कुत्तोंको टुकड़ा डालनेमें भी पाप है उसमें कुत्तोंके प्रति झूठी दया है, क्षुधापीड़ित कुत्तेको रोटीका टुकड़ा देने में उस कुत्तेका अपमान है । आवारा कुत्ते समाजकी सभ्यता या दयाके चिह्न नहीं हैं; बल्कि समाजके अज्ञान तथा आलस्यके चिह्न हैं । जानवर अपने भाई-बन्द हैं। में इनमें सिंह, बाघ और अन्य पशुओंको भी गिनता हूँ । हम लोगोंको सिंह, सर्प आदिके साथ रहना नहीं आता इसका कारण हमारी शिक्षाकी त्रुटि है । जब मनुष्य उनको अधिक अच्छी तरह पहचानेगा, तब वह इस तथ्यको जान लेगा और ऐसे जीवोंतकको पालना सीखेगा। आज तो मनुष्यने विधर्मी अथवा विदेशी मनुष्योंतकको अपनाना नहीं सीखा है । कुत्ता तो वफादार साथी है। कुत्तों और घोड़ोंकी स्वामिभक्तिके चाहे जितने दृष्टान्त मिल सकते हैं। इसलिए हम जैसे अपने साथीको इधर-उधर भटकते फिरने नहीं देते, बल्कि उसे आदरपूर्वक रखते हैं, हमें वैसा ही कुत्तोंके बारेमें करना चाहिए । हम आवारा कुत्तोंके सम्प्रदायको बढ़ाकर कुत्तोंके प्रति हमारा जो दायित्व है, उससे मुक्त नहीं होते । दूसरी ओर, अगर हम आवारा कुत्तोंके अस्तित्वको पाप समझते हैं और इस- लिए उनको खानेको नहीं देते, तो हम कुत्तोंकी सेवा करते हैं और उनको सुख देते हैं । तब वह आदमी जो कुत्तोंके प्रति भी दयाधर्म पालना चाहता है क्या करे ? उसे अपनी आमदनीमें से कुत्तोंका भाग निकालकर उसका उपयोग जानवरोंकी संस्थाओं- को सौंप देना चाहिए। अगर ऐसी संस्था शक्य न हो -- और मेरा खयाल तो यह है कि शक्य होते हुए भी ऐसी संस्था है बहुत मुश्किल -- तो व्यक्ति स्वयं एक या अधिक कुत्तोंको पालनेका प्रयत्न करे । अगर वह यह भी न कर सके, तो उसे कुत्तोंका प्रश्न छोड़कर अपने जीवदयाभावका अमल अन्य प्राणियोंके विषयमें करना चाहिए। " लेकिन आपने तो उन्हें मारने की बात कही है ? " इस प्रकारके प्रश्न पत्रलेखक कोई आवेशमें और कोई प्रीतिसे पूछते हैं। मैंने कुत्तोंके मारनेको कोई स्वतन्त्र धर्मकी तरह प्रस्तुत नहीं किया है; मैंने तो उसे आपद्धर्म ही अन्य - Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५८२
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