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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५८३

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क्या यह जीवदया है - ३ ५४७ बताया है । मैंने परिस्थिति विशेषमें उसे धर्म कहा है । अगर कुत्तोंकी रक्षा राजा न करे, पंच भी न करें, यदि लोग खुद भी उन्हें न पाल सकें और कुत्तोंसे दुःख पायें तथा उनकी भेंट चढ़नेके लिए तैयार न हों, तो उन्हें तथा अपनेको पीड़ा और भयसे मुक्त करनेके उपायकी तरह इसका अवलम्बन करें। यह कड़वा घूंट है, लेकिन मेरी अन्तरात्मा कहती है कि उसमें शुद्ध प्रेम और दया है । 1 कुत्तोंकी आजकी स्थिति हिन्दुस्तानके दुबले पशुओं तथा मनुष्यों जैसी है। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि इस शोचनीय परिणामका कारण हमारी अहिंसा धर्मकी अनभिज्ञता अहिंसाका हममें अभाव होना है। धर्मका फल पामरता, भुखमरी, दुष्काल इत्यादि हर्गिज नहीं है । अगर यह देश पुण्यभूमि हो तो आज हम जो दारिद्र्य अपने चारों ओर व्याप्त देखते हैं, वह दिखाई नहीं दे सकता था । कई उतावले और अधीर लोगोंने इससे यह सार निकाल लिया है कि अहिंसा धर्म ही झूठा है । मैं जानता हूँ कि अहिंसा धर्म झूठा नहीं है, बल्कि उसके पुजारी झूठे हैं । अहिंसा क्षत्रियका धर्म है। महावीर क्षत्रिय थे । बुद्ध क्षत्रिय थे। राम, कृष्ण आदि क्षत्रिय थे । वे सब, थोड़े या बहुत, अहिंसाके उपासक थे। हम उनके नामपर भी अहिंसाका प्रवर्तन करना चाहते हैं । लेकिन इस समय तो अहिंसाका ठेका भीरु वैश्यवर्गने ले रखा है; इसलिए वह धर्म निस्तेज हो गया है । अहिंसाका दूसरा नाम है क्षमाकी परिसीमा । लेकिन क्षमा तो वीर पुरुषका भूषण है । अभयके बिना अहिंसा सम्भव नहीं हो सकती; हम लोग तो जीवदयातक नहीं जानते । हम गायोंको बचा नहीं सकते, कुत्तोंको लातों और लाठियोंसे मारते हैं, उनकी एक-एक पसली दिखाई देती है । हमें इससे शर्म नहीं आती, लेकिन अगर आवारा कुत्ता मरता है तो हमें दुःख होता है । पाँच हजार कुत्ते भूखे तरसते फिरते रहें, जूठन और मैला खायें और मरें नहीं, यह सब अच्छा या उनमें से पचास मर जायें और शेष सुरक्षित रहें सो अच्छा ? लाठी मारकर कुत्तेको बाहर कर देना तो पाप है ही । लेकिन यह दुःख न देख सकनेवाला व्यक्ति एक या अधिक कुत्तोंको गोली मारकर पुण्य करता है - यह बात समझी जा सकती है । हमेशा ही प्राण लेना हिंसा नहीं है । या यों कहें कि अनेक अवसरोंपर प्राण न लेनेमें अधिक हिंसा है । मैं इसका विवेचन आगे चलकर करूँगा । [ गुजरातीसे ] नवजीवन, २४-१०-१९२६ Gandhi Heritage Portal