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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५९०

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५७५. पत्र : श्री और श्रीमती पोलकको प्रिय हेनरी और मिली, साबरमती २६ अक्तूबर, १९२६ तुम्हारे पहले तारको पढ़कर ही मेरा मन बुरीसे-बुरी खबर सुननेके लिए तैयार हो चुका था; फिर भी इस समाचारसे मुझे बड़ा सदमा पहुँचा। दूसरा तार जिस समय मिला बा मेरे पास थी । वह कुछ बातचीत करने आई थी। वह समझ गई कि मुझे कितना गहरा सदमा पहुँचा है । उम्मीद है कि तुम्हें मेरे दोनों तार' यथासमय मिल गये होंगे। मैं जानना चाहता हूँ कि वे तार तुम्हें मिले या नहीं; क्योंकि मैं यह चाहता हूँ कि तुम यह समझ लो कि तुम्हारे इस दुःखमें मैं तुम्हारे साथ हूँ । tr " तुम जानते हो कि उसने मुझे मेरे पत्रके उत्तरमें केवल एक ही स्नेहपत्र लिखा था । उस पत्र में भी मुझे उसी अदम्य इच्छाशक्तिके दर्शन हुए जो मुझे जब वह मेरे साथ सोया करता था, तब दिखाई दिया करती थी । आत्माकी अमरतामें मेरा विश्वास पहलेसे ज्यादा दृढ़ हो गया है। इसलिए, मैं जानता हूँ कि उसका कुछ भी नष्ट नहीं हुआ है । मृत्यु तो निद्रा और विस्मृतिकी एक स्थिति-भर है यह वाक्य तुम्हारे और मेरे लिए एक काव्योक्ति-भर नहीं है । वाल्डोके लिए यह जीवन उच्चतर जीवनकी अवस्थामें पहुँचनेकी एक सीढ़ी-जैसा ही था। ईश्वर तुमको यह दुःख सहन करनेकी शक्ति दे। शायद इस विचारसे तुम्हें सान्त्वना मिलेगी कि हम सबको उसी राह जाना है, जिसपर वाल्डो गया है । हम सबके स्नेह सहित, अंग्रेजी पत्र (एस० एन० १०८३४) की फोटो - नकलसे । तुम्हारा, भाई १. ये उपलब्ध नहीं हैं। २. वाल्डो; पोलकका ज्येष्ठ पुत्र । ३. " डैथ इज बट ए स्लोप ऐंड ए फॉरगेटिंग " । Gandhi Heritage Portal