किसानोंके लिए एक नियामत ५६३ इस यन्त्रकी सादगी, परम उपयोगिता और पशुके प्रति दयाभाव -- इन सब गुणोंको माना और बहुत पसन्द किया था । ५० फीटके ढ़ालके योग्य सामग्रीकी लागत २७५ रुपये होती है। लेकिन श्रीयुत रामचन्द्रन कहते हैं कि यदि यह कोस लोकप्रिय हो जाये तो मूल्य और कम किया जा सकता है । गहराईके खयालसे श्रीयुत रामचन्द्रन कहते हैं कि ३० फीटकी गहराईके लिए उसकी लागत २३० रुपये ही होगी और समुचित संगठन द्वारा यह कोस हिन्दुस्तानी किसानोंके लिए १५० रुपये में भी तैयार हो सकता है। मैंने उन्हें यह भी सुझाया है कि यदि पेटेंट-स्वत्व छोड़ दिया जाये या उसके जो पुर्जे अमुक स्थानपर अपने ही यहाँ तैयार किये जा सकते हैं, वे या तो बना या खरीद लिये जायें तो मूल्यमें और भी कटौती की जा सकती है। कोसके इस वर्तमान मूल्यमें एक भैंसेका मूल्य फर्ज कर लें, ३० रु० और जोड़ दें। तब भी कोसकी पूरी लागत ३०५ रुपये से अधिक न होगी। दो बैल ३०० रुपये से लेकर ४०० रुपये तकमें मिलेंगे। उनपर होनेवाला माहवारी खर्च तो आधा ही हो जायेगा। दो बैलोंको पालनेमें ५० से ६० रु० लगेंगे। लेकिन एक भैंसा २० से २५ रुपयेतक में पाला जा सकता है। इस आविष्कारसे सबसे बड़ा लाभ यह है कि पशुओंकी मेहनतमें बहुत बचत हो जाती है । और उससे भी बड़ा फायदा तो यह है कि भैंसे काममें लाये जा सकते हैं -- वे अधिकांशतः अपनी अनुपयोगिताके कारण (अगर वे बूचड़खानोंसे बच जाते हैं तो ) यों ही भूखों मर जाते हैं । इसलिए आश्चर्यकी बात तो यह है कि यह आविष्कार सरकारका ध्यान अपनी ओर क्यों नहीं खींच पाया। श्रीयुत रामचन्द्रनको उन अधिकारियोंकी उदासीनतासे सख्त शिकायत है, जिन-जिनके पास उन्होंने अपनी फरियाद पेश की है। लेकिन मैंने उनकी इन शिकायतोंका खास जिक्र न करना ही अच्छा समझा । जो लोग चाहें आश्रम आकर इस कोसको सुबहके वक्त चालू हालतमें देख सकते हैं। चूंकि आजकल आश्रमको बहुत ज्यादा पानीकी जरूरत नहीं है, इसलिए कोस दिनभर चालू नहीं रखा जाता । लेकिन ८ बजेसे १० बजेतक तो हमेशा ही चला करेगा और स्वयं आविष्कर्त्ताकी देखरेखमें रहेगा, जो कि उसके विषयमें सारी बातें स्वयं समझाया करेंगे । एक मित्रने पूना कृषि-प्रदर्शनीके सिलसिलेमें मुझे लिखा है : मैं यहाँ राशि राशि कलों और औजारोंको देखता हूँ; इनमें से अधिकांश हम कभी इस्तेमाल ही नहीं कर सकते। मुझे वह चीज तो यहाँ दिखाई ही नहीं देती जो कि भारतवर्षमें मनुष्य एवं पशुके लिए महा उपयोगी है -- यानी रामचन्द्रन् कोस' । मैं कृषि विद्याके बारेमें इतना अधिक तो नहीं जानता जितना कि उक्त मित्र अपने जोशको प्रमाणित करते हुए कहते हैं; लेकिन इतना कह सकनेके योग्य जरूर जानता कि इस कोसकी परीक्षा ऐसे प्रत्येक व्यक्ति द्वारा की जानी जरूरी है, जो भारतवर्षकी कृषि सम्बन्धी समस्याओंमें दिलचस्पी रखता हो । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, २८-१०-१९२६ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५९९
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