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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६०१

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प्रिय मित्र, ५८५. पत्र : रोमाँ रोलाँको साबरमती २९ अक्तूबर, १९२६ मीराने आपके सुन्दर पत्रका बहुत अच्छा अनुवाद कर दिया है । मेरा खयाल है कि मैं पत्रकी भावना पूरी तरह समझ गया हूँ। अगर मुझे ऐसा लगता कि निमन्त्रण किसीके कहने से न दिया जाकर स्वयंस्फूर्त है तो मैं खुशी से हेलसिंगफोर्स चला जाता । न जानेके दूसरे कारण भी थे। मैं अपने अन्तरके आदेशकी प्रतीक्षा करता रहा, लेकिन वह मिला नहीं । मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यह आदेश मिलने पर मैं उसकी अवहेलना नहीं करूँगा । लगता है, आपकी पुस्तककी मेरी समीक्षा ठीक तरहसे उद्धृत नहीं की गई । मुझे मालूम था कि आपने जो कुछ लिखा है, अपने गहनतम विश्वाससे प्रेरित होकर ही लिखा है । मैं अपनी एक और चिन्ता भी दूर करना चाहता हूँ । आपको जो अलबम भेंट किया गया, उसमें मेरा भी योग है । कविवरने मुझे इस आशयकी खबर भेजी है कि 'आप अपनी ही इच्छासे मेरे प्रचारक बन गये हैं', मेरे इस कथनसे आपके मनको कुछ चोट पहुँची है। सिवा इसके और क्या कहूँ कि इन शब्दोंका प्रयोग मैंने आपके प्रति अपना स्नेह और आदर, और साथ ही आप जैसे व्यक्तिका सम्मान पानेकी अपनी अयोग्यता दर्शानेके लिए ही किया था । और जब मैं कहता हूँ कि मेरे गुणोंका जो इतना ढोल पीटा जा रहा है वह मेरी समझमें नहीं आता तो कोई साधारण आदमी भले ही उसपर विश्वास न करे, लेकिन आप जैसा व्यक्ति तो उसे समझ सकता है । मुझमें झूठी नम्रता नहीं है । मुझे यह आशा जरूर है कि किसी दिन मैं सचमुच आपके दर्शन कर सकूंगा । आशा है, आपका स्वास्थ्य ठीक होगा । शुभ कामनाओंके साथ, अंग्रेजी प्रति (एस० एन० १२१७५) की फोटो नकलसे । हृदयसे आपका, १. मोरा बहनको लिखे पत्रको तारीख २६ सितम्बर १९२६ थी, देखिए परिशिष्ट ७ (एस० एन० १२१७४ ) । २. गांधीजी १९३१ में लन्दन में द्वितीय गोलमेज परिषद् में भाग लेनेके बाद भारत आते समय रास्ते में स्विटजरलैंडमें रोमा रोल से मिले थे । Gandhi Heritage Portal