५७० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय सच्ची बात तो यह है कि अहिंसाका अर्थ केवल 'जीवोंको न मारना' ही नहीं है । क्रोध अथवा स्वार्थके वश किसी मनुष्यका अनिष्ट करनेके इरादेसे उसे दुःख देने या उसकी देहको हानि पहुँचानेका नाम हिंसा है। ऐसा न करना ही अहिंसा है । वैद्य कड़वी दवा देता है । वह दुःख देता है; किन्तु हिंसा नहीं करता । यदि कड़वी दवा देनेके समय भी वह कड़वी दवा नहीं देता तो वह अहिंसा धर्मके पालनमें चूकता है । शल्यचिकित्सक अगर दुःख देनेके भयसे गले हुए हाथको नहीं काटता तो वह हिंसा करता है । जो मनुष्य अपने आश्रित बालकके ऊपर (जो उससे रक्षाकी आशा रखता है) आक्रमण करनेवाले खूनीको (अगर उसका उपद्रव दूसरी तरहसे न रोका जा सके) नहीं मारता, तो वह पुण्य नहीं बल्कि पाप करता है। वह अहिंसा धर्मका पालन नहीं करता, बल्कि मोहके वश होकर अहिंसाके नामपर हिंसा करता है । ऐसा होता है सामाजिक अहिंसा-धर्म । अब हम अहिंसाके मूलकी खोज करें। उसके मूलमें निःस्वार्थता है । निःस्वार्थताका अर्थ है देहाभिमानका सर्वथा अभाव । किसी ऋषि या मुनिने देहाभिमान यानी देहाध्यासको लेकर किसी मनुष्यको छोटे-मोटे अनेक देहोंका नाश करते हुए देखा तो मनुष्यके गूढ़ अज्ञानको देखकर उसका हृदय काँप गया। उसने सोचा कि देहका आवरण होनेसे मनुष्य अपने में ही रहनेवाली अमर आत्माको भूल जाता है और आत्माके कल्याणकी साधनाके बजाय अपनी- क्षणिक देहके स्वार्थको साधता है। इस प्रकार ऋषिने सर्वस्वके सम्पूर्ण त्यागकी आवश्यकता देखी। उसने देखा कि मनुष्य अगर आत्मा यानी सत्यका दर्शन करना चाहता है तो उसके लिए एकमात्र समुचित मार्ग है अपनी देहका त्यागकर देना । इसका अर्थ दूसरे जीवोंको अभयदान देना हुआ । यह अहिंसाका मार्ग है । इस प्रकार विचार करें तो मालूम होगा कि पाप दूसरे जीवोंका नाश करनेमें, अपनी देहसे मोह करनेमें और अपनी क्षणिक देहके लिए दूसरे जीवोंका नाश करनेमें है । इससे आहारके निमित्त मनुष्य जीव-नाश करता है, उसमें देहाध्यास है और इसलिए वह हिंसा है । परन्तु मनुष्य उसे अनिवार्य समझकर करता है। किन्तु दुःखसे पीड़ित प्राणीकी देहका उसीकी शान्तिके लिए किया गया नाश अथवा अपने संरक्षित जनकी रक्षाके लिए किया गया अनिवार्य वध हिंसा दोषमें नहीं गिना जा सकता । इस विचारसरणीका बहुत दुरुपयोग हो सकता है । किन्तु उसका कारण विचार- दोष नहीं, वरन् देहके प्रति मोहवश अपने-आपको धोखा देनेके लिए जो भी बहाना मिल सके, फौरन उसका उपयोग कर लेनेका हमारा स्वभाव है । किन्तु इस दुरुपयोगके भयसे सत्यको छिपाकर अहिंसा-मार्गको स्पष्ट नहीं किया जा सकता । इस विवेचनसे अहिंसा सम्बन्धी जो सार निकलता है, वह यह है : (१) इस जगतमें कोई भी देहधारी कुछ हदतक हिंसा किये बिना अपनी देहको टिकाये नहीं रख सकता । (२) (क) अपनी देहकी रक्षाके लिए (ख) अपने आश्रितकी रक्षाके लिए और (ग) कभी-कभी दुःखी जीवोंको शान्ति देनेके लिए सभी अनेक जीवोंका वध करते हैं । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६०६
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