क्या यह जीवदया है ? -४ ५७१ (३) अहिंसाकी व्याख्याके अनुसार (क) और (ख) में थोड़ा बहुत हिंसा-दोष आता ही है । (ग) में हिंसा दोष बिलकुल नहीं है। इससे वैसा वध सर्वांशमें अहिंसा- पूर्ण है; किन्तु (क) और (ख) का हिंसापूर्ण होना भी अनिवार्य है । (४) इसलिए (क) और (ख) में निहित हिंसा, ऊर्ध्वगामी अहिंसावादी मनुष्य कमसे कम परिमाणमें, जब उससे छुटकारा न मिल सके तभी और खूब समझ-बूझकर - दूसरे सब उपाय कर चुकने के बाद ही करेगा । मेरा बताया हुआ कुत्तोंका वध चौथे प्रकारकी हिंसा है। इससे जब वह अनि- वार्य हो, उसके बिना काम चलता ही न हो तब वह सम्यक् विचारके बाद ही किया जा सकता है । किन्तु इस विषयमें मुझे शंका नहीं है कि जब वह वध अनिवार्य हो जाये तब उसे न करनेमें ही विशेष दोष है । इसलिए कुत्तोंको मारना व्यापक धर्म तो नहीं हो सकता। मगर खास स्थितिमें खास अवसरपर, व्यक्ति विशेषके लिए वह आवश्यक हो सकता है । अब इतना विचार करनेके बाद मेरे पास जो कुछ पत्र आये हैं, मैं उनके प्रश्नोंका सिलसिलेवार उत्तर देनेका प्रयत्न करता हूँ । कई भाई अपने पत्रोंका व्यक्तिगत उत्तर माँगते हैं और वह न मिले तो अपने विचार समाचारपत्रोंमें छपा देनेकी धमकी देते हैं । व्यक्तिशः जवाब देना मेरी शक्तिके बाहर है। जिनको जवाब देना उचित जान पड़ेगा उनको मैं इस पत्रके स्तम्भमें ही दे सकूंगा । जिन्हें दूसरे पत्रोंमें इसकी चर्चा करनी हो, उन्हें रोकनेका मुझे जरा भी अधिकार नहीं है; इच्छा भी नहीं है । मैं पत्र-लेखकोंको यह याद दिला देना चाहता हूँ कि धर्म चर्चामें धमकी या अधीरताके लिए कोई स्थान नहीं है । एक भाई लिखते हैं: आपको ५७ वर्षकी उम्रमें कुत्तोंको मरवानेका धर्म कैसे सूझा ? अगर पहले सूझ चुका था तो आप अबतक मुँहमें दही जमाये क्यों बैठे थे ? मनुष्यको सत्य जब सूझता है, वह उसे तभी बताता है । चाहे वृद्धावस्थामें सूझे, चाहे प्रसंग उपस्थित होनेपर । ऊपर बताई गई मर्यादाओंमें रहते हुए प्राणियोंको मारनेका धर्म तो में बरसों पहले स्वीकार कर चुका हूँ । प्रसंग पड़नेपर मैंने उसपर अमल भी किया है । फिर हिन्दुस्तानके गाँवोंमें अनजान, आवारा कुत्ते अगर भाग नहीं जाते तो उन्हें मार देना अबतक धर्म माना जाता है । गाँवोंमें लोग कुत्ते पालते हैं। वे कुत्ते दूसरे बाहरी कुत्तोंको भगा देते हैं; और अगर वे भागते नहीं हैं तो गाँवके कुत्ते उन्हें मार डालते हैं । ग्रामीण लोग ऐसे रखवाले कुत्ते जानबूझकर पालते हैं । ये गाँवोंके कुत्ते केवल दूसरे कुत्तोंको ही नहीं मारते, बल्कि चोरों इत्यादिपर भी हमला करते हैं। आवारा कुत्तोंकी परेशानी तो सिर्फ शहरोंमें ही है और इसका एकमात्र उपाय उन्हें न रहने देना ही है। इसमें कुत्तोंका कमसे कम नाश होता है और शहरोंके लोगोंकी रक्षा होती है । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६०७
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