स्तरपर है। और में कहूँगा कि उस सुधार तकके लिए, जिसे हम लोग चाहते हैं, प्रार्थना जरूरी है ताकि और अधिक आत्मशुद्धि प्राप्त की जा सके। प्रार्थनाके बिना, मनुष्य मात्रका सामान्य शुद्धीकरण, आपसकी सहिष्णुता तथा पारस्परिक सद्भाव सम्भव नहीं है ।
अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, ४-११-१९२६
६००. अन्त्यजोंका पूजाधिकार
नीमच छावनीके एक भाई पूछते हैं :
(१) अछूत, जिनको उच्च वर्णके हिन्दू अतिशूद्र भी कहते हैं, विष्णु भगवानका मन्दिर बनाने, विष्णुकी मूर्तिकी पूजा करने और मूर्तिको विमानमें बिठाकर सरे बाजार निकालनके अधिकारी हैं या नहीं ?
(२) क्या अतिशूद्र द्वारा पूजित विष्णुकी मूर्तिके दर्शन करनेसे वैष्णव नरकगामी होते हैं ? अब भी ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं, यही दुःखकी बात है । मेरा दृढ़ विश्वास है कि अन्त्यज भाइयोंको विष्णु भगवान्की मूर्ति बाजारमें निकालने और विमानमें बिठानेका उतना ही अधिकार है जितना अन्य जातियोंको है। इसी तरह जो वैष्णव अतिशूद्र- पूजित मूर्तिकी पूजा करता है या उसके दर्शन करता है, वह पाप नहीं, पुण्य करता है । जान बूझकर ऐसी मूर्तिकी पूजासे बचनेवाला वैष्णव धर्मकी निन्दा करता है ।
हिन्दी नवजीवन, ४-११-१९२६