५८६ 1 सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय इसका एक सीधा-सा उत्तर यही मालूम पड़ता है कि उसे वही करना चाहिए जो खुद भारतीय चाहते हैं, और सचमुच हम लोगोंमें जो नासमझ हैं वे इस उत्तरसे सन्तुष्ट हो जाते हैं। पर मेरी तरहके लोग जो कुछ अधिक समझते हैं, वे जानते हैं कि किसी भी देशके देशभक्तोंमें इस बातपर भी पूर्ण सहमति नहीं है कि उनके देशमें कौन से मुख्य-मुख्य राजनीतिक कदम उठाये जाने चाहिए। और भारतमें ये मतभेद अपेक्षाकृत कहीं अधिक गहरे और व्यापक हैं - यह बात बिलकुल साफ दिखाई देती है, और इसे देखकर चोट पहुँचती है। क्या यह स्थिति इस समस्याको असाध्य बना देती है ? मेरा मतलब इस देशमें हमारी अपनी समस्यासे है, आपके देशमें आपकी समस्यासे नहीं । मैं समझता हूँ कि इसका उत्तर देते समय हम दोनोंको ही यह बात स्वीकार करनी पड़ेगी कि पहलेके सभी राष्ट्रवादी आन्दोलनोंको तभी सफलता मिली जब किसी संगठनबद्ध संस्थाके लोगोंने स्वदेशकी स्वतन्त्रताके लिए त्याग करनेको तैयार जनताके एक विशाल समुदायका समर्थन पा लिया था । उदाहरणके तौरपर इटलीको लीजिए। उसे राष्ट्रीय स्वतन्त्रता तभी प्राप्त हो सकी जब काबूर और गैरी- बाल्डीने इटलीके विशाल जन समुदायको मेज़िनीकी नीतिसे विरत करके अपनी नीतिके पक्षमें कर लिया था। (मेरा अपना विश्वास है कि मेजिनीकी नीति सही और काबूरकी गलत थी -- पर यहाँ इस बातसे कोई मतलब नहीं । ) विदेशोंके लोग भी स्वतन्त्रता प्राप्त करनेमें इटलीको इसीलिए सहायता दे सके कि वहाँ कुछ ऐसे गिने-चुने लोग मौजूद थे जिनको इटलीकी समस्त जनताका तो नहीं, पर हाँ उसके एक इतने विशाल समुदायका स्पष्ट समर्थन प्राप्त था कि वे इटलीके प्रतिनिधियोंकी हैसियतसे बात कर सकते थे । भारतमें तो अभी अनेकों वर्षोंतक ऐसी स्थिति बनने की कोई सम्भावना दिखाई नहीं पड़ती। ऐसी स्थितिमें भारतके मित्र क्या कर सकते हैं ? जहाँतक में समझता हूँ, इसके दो ही उत्तर हो सकते हैं । वे अपनी ओरसे भारतके कुछ लोगोंके एक ऐसे समुदायको चुन सकते हैं, जिसके अपने कुछ निश्चित विचार हों और जिसने अपना कार्यक्रम इतना सोच-समझकर निर्धारित किया हो कि उसकी व्यावहारिकता पर काफी कुछ भरोसा किया जा सके। भारतके मित्रगण उस नीतिको अपनाकर फिर आशा कर सकते हैं कि ब्रिटेनमें समाजवादी विचारोंके लोगों द्वारा इस नीतिके अपना लिये जानेपर भारतकी जनता भी उसे बादमें धीरे-धीरे सर्वथा उचित समझने लगेगी और तब उसपर अमल किया जा सकेगा। या फिर वे अपनी ही एक नीति निर्धारित कर सकते हैं, एक ऐसा संविधान तैयार कर सकते हैं जिसपर उनकी रायमें अमल किया जा सकेगा और जिसे भारतके उन लोगोंका समर्थन भी शायद बादमें मिल जायेगा जिन्हें आज एक-दूसरेके प्रस्तावोंमें कुछ भी सराहनीय नहीं प्रतीत होता है । आप इन दोनोंमें से किसे पसन्द करते हैं ? या ऐसा कोई तीसरा मार्ग भी है जो मुझे नहीं सूझता ? इनमेंसे दूसरा विकल्प देखने में बड़ा धृष्टतापूर्ण मालूम पड़ता है, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देशके हम लोगोंको एक ऐसा अनुभव प्राप्त है जो अन्य देशोंके लोगोंको नहीं है। हमें लोकतान्त्रिक संस्थाएँ चलानेका ही नहीं, बल्कि अन्य देशोंके लिए संविधान तैयार करनेका भी अनुभव है । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६२२
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